महाशिवरात्रि कब है जानें पूजा विधि व महत्व

शिव भक्ति के लिए महाशिवरात्रि सिर्फ एक व्रत नहीं बल्कि यह एक आध्यात्मिक उत्सव है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का पर्व हर साल मनाया जाता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत और उपवास करने से भगवान शिव अपने भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इस बार महाशिवरात्रि का पर्व 15 फरवरी को मनाया जाएगा। आइए जानते हैं महाशिवरात्रि पर इस बार कौन से शुभ योग रहने वाले हैं। साथ ही जानें महाशिवरात्रि व्रत की पूजा विधि।
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फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि का आरंभ 15 फरवरी को शाम में 5 बजकर 5 मिनट पर होगा। वहीं, अगले दिन यानी 16 फरवरी को शाम में 5 बजकर 35 मिनट पर तिथि समाप्त होगी। शास्त्रों के नियम के अनुसार, महाशिवरात्रि का पर्व जब मनाया जाता है जब चतुर्दशी तिथि निशीथ काल का समय भी लग रही हो। ऐसे में 15 फरवरी को चतुर्दशी तिथि निशीथ काल के समय होने के कारण 15 फरवरी को ही महाशिवरात्रि का व्रत किया जाएगा।
महाशिवरात्रि व्रत का महत्व
शास्त्रों और पुराणों के अनुसार, महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे बड़ा पर्व है। इस दिन माता पार्वती और भगवान शिव का विवाह हुआ था। महाशिवरात्रि के दिन किए गए पूजा पाठ का दोगुना फल प्राप्त होता है। इस दिन भक्तजन रात में भगवान शिव और माता पार्वती का जागरण करते हैं और उनका ध्यान करते हैं। उनपर भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद बना रहता है। इस दिन चार प्रहर की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। अगर समय न मिल पाए तो कम से कम एक प्रहर की पूजा अर्चना जरुर करें।
महाशिवरात्रि पूजा सामग्री
1) भांग, धतूरा और बेलपत्र,
2) शिव जी की तस्वीर या छोटा शिवलिंग
3) मदार पुष्प या फूलों की माला
4) शमी के पत्ते
5) सफेद या कमल के फूल
6) चंदन
7) केसर
8) जनेऊ
9) अक्षत
10) पान-सुपारी और छोटी इलायची
11) इत्र
12) लौंग
13) रक्षा सूत्र
14) भस्म
15) कुश का आसन
16) भगवान शिव के अभिषेक के लिए गाय का दूध, दही, शक्कर और गंगाजल
17) महादेव के वस्त्र
18) माता पार्वती के श्रृंगार का सामान, लाल चुनरी और वस्त्र
19) शहद
20) भोग के लिए मिठाई या हलवा
21) हवन सामग्री
चार प्रहर की पूजा का महत्व
शास्त्रों में महाशिवरात्रि की रात के चारों प्रहरों में शिव पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। प्रत्येक प्रहर की पूजा का अलग आध्यात्मिक फल होता है। चारों प्रहर की पूजा करने से धन, यश, स्थिरता, और संतान से जुड़ी बाधाओं से मुक्ति मिलने की मान्यता है।
चार प्रहर पूजा मुहूर्त
प्रथम प्रहर: शाम 6:15 – 9:28
द्वितीय प्रहर: रात 9:29 – 12:41
तृतीय प्रहर: रात 12:42 – सुबह 3:54 (16 फरवरी)
चतुर्थ प्रहर: सुबह 3:55 – 7:07 (16 फरवरी)
शिवलिंग अभिषेक की सामग्री और लाभ
शहद से अभिषेक: करियर और कार्य से जुड़ी परेशानियाँ दूर होती हैं
दही से अभिषेक: आर्थिक स्थिति मजबूत होती है
गन्ने का रस: माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं
अभिषेक के समय ‘ॐ पार्वतीपतये नमः’ मंत्र का 108 बार जाप करने से अचानक आने वाले संकटों से रक्षा होती है।
जानिए संपूर्ण पूजा विधि
शिवलिंग को पंचामृत से स्नान कराएं
केसर मिला जल अर्पित करें
पूरी रात दीपक जलाएं
चंदन का तिलक लगाएं
बेलपत्र, भांग, धतूरा, फल, मिठाई, गन्ने का रस, सुगंध और दान अर्पित करें
अंत में केसर की खीर चढ़ाकर प्रसाद बांटें
क्यों मनाया जाता है महाशिवरात्रि का पर्व?
दुनिया भर में लोग भगवान शिव की कल्पना अपनी-अपनी आस्था के अनुरूप करते हैं. कोई उन्हें भोले के रूप में देखता है तो कोई उन्हें बाबा बर्फानी के रूप में पूजता है. कुछ लोग उन्हें विश का प्याला पीने वाले महादेव के रूप में देखता है तो कोई उन्हें हांथ में डमरू त्रिशुल लिये पूरी दुनिया को नचाने वाले मदारी के रूप में देखता है. शिव शंकर को आदि और अनंत माना गया है जो पृथ्वी से लेकर आकाश और जल से लेकर अग्नि हर तत्व में विराजमान हैं.
सारे देवों में शिव ही ऐसे देव हैं जो अपने भक्तों की भक्ति-पूजा से बहुत जल्द प्रसन्न हो जाते हैं. महाशिवरात्रि के पर्व के बारे में मिथ है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि को भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था. पौराणिक कथाओं के अनुसार महाशिवरात्रि में किसी भी प्रहर अगर भोले बाबा की आराधना की जाए तो भोले त्रिपुरारी दिल खोलकर भक्तों की कामनाएं पूरी करते हैं. महाशिवरात्रि भगवान शिव के पूजन का सबसे बड़ा पर्व है. फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाता है.









