पौराणिक स्वरूप में निखरेंगे 84 महादेव, भोपाल के एक्सपर्ट जुटे

उज्जैन। सिंहस्थ के पहले उज्जैन के प्राचीन 84 शिव मंदिरों के कायाकल्प की तैयारी शुरू हो गई है। ये सभी मंदिर जल्द ही अपने मूल और प्राचीन स्वरूप में नजर आएंगे। मंदिरों की बनावट से लेकर उनके पारंपरिक रंगों तक, हर पहलू में प्राचीनता की झलक दिखाई देगी। इस महापरियोजना के लिए स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर भोपाल की टीम प्लानिंग तैयार कर रही है, जबकि निर्माण और सौंदर्याकरण का जिम्मा उज्जैन विकास प्राधिकरण को सौंपा गया है।
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भोपाल के संस्थान की 5-6 विशेषज्ञों की टीम पिछले डेढ़ महीने से उज्जैन के इन मंदिरों पर रिसर्च कर रही है। टीम एडवांस टूल्स के जरिए प्रत्येक मंदिर की नपती कर विस्तृत प्लान तैयार कर रही है। कुछ मंदिरों का सर्वे पूरा कर प्लान यूडीए को सौंप दिया गया है। प्राधिकरण का लक्ष्य है कि अगले एक-डेढ़ महीने में जीर्णोद्धार का कार्य जमीनी स्तर पर शुरू कर दिया जाए, ताकि सिंहस्थ से पहले सभी 84 मंदिरों का काम समय सीमा में पूरा हो सके।
पौराणिक महत्व : अंधकासुर के रक्त की बूंदों से हुई स्थापना
मान्यता है कि जब भगवान शिव ने अंधकासुर नामक दानव का वध किया था, तब उसके रक्त की 84 बूंदें धरती पर गिरी थीं। इन्हीं स्थानों पर 84 शिवलिंगों की स्थापना हुई।
माना जाता है कि इन मंदिरों की तीर्थयात्रा करने से पिछले जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
खंडित प्रतिमाओं का भी होगा जीर्णोद्धार
स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर भोपाल के प्रोफेसर सुशील सोलंकी के अनुसार, मंदिरों को न केवल प्राचीन स्वरूप दिया जाएगा, बल्कि जो प्रतिमाएं खंडित हो चुकी हैं, उन्हें भी शास्त्रोक्त विधि से फिर से तैयार करने का प्लान बनाया गया है। जीर्णोद्धार के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा जा रहा है कि मंदिरों की मौलिकता और ऐतिहासिकता के साथ कोई समझौता न हो।
श्रद्धालुओं के लिए मैप और मान्यताएं होंगी अंकित
वर्तमान में कई प्राचीन मंदिरों के नाम और उनकी पौराणिक मान्यताओं की जानकारी श्रद्धालुओं को आसानी से नहीं मिल पाती है। इसे ध्यान में रखते हुए नए प्लान में विशेष व्यवस्था की गई है
नाम व शिलालेख- प्रत्येक मंदिर के बाहर उसका नाम और उससे जुड़ी पौराणिक कथा/मान्यता स्पष्ट रूप से अंकित की जाएगी।
दर्शन मार्ग मैप- पूरी 84 महादेव यात्रा के लिए विशेष मैप और संकेतक लगाए जाएंगे, ताकि बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को मंदिर ढूंढने में असुविधा न हो।
पर्यटन स्थल के रूप में विकास- जिन मंदिरों के पास पर्याप्त भूमि उपलब्ध है, वहां परिसर का सौंदर्याकरण कर उन्हें पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा।









