जांच के लिए मरीज को गोद में 300 मीटर तक ले जाना पड़ रहा

जिला अस्पताल में कर्मचारियों की बड़ी लापरवाही
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अक्षरविश्व न्यूज. उज्जैन:जिला चिकित्सालय में उपचार कराने से मरीज क्यों कतराते हैं इसका जीता जागता उदाहरण लापरवाही और अनियमितताएं हैं। यहां मरीजों और उनके परिजनों के साथ किये जाने वाले अमानवीय व्यवहार के कारण लोग सरकारी सुविधा होने के बावजूद उपचार कराने नहीं आते क्योंकि स्टाफ मरीजों पर ध्यान नहीं देता यहां तक कि अस्पताल परिसर में ही जांच कराने के लिये मरीजों को परिजन गोद में उठाकर ले जाते हैं।

गेट पर लाकर बोले…ऑटो बुलाकर ले जाओ:सतीश पिता भंवरलाल 14 वर्ष निवासी पिपल्या डाबी को बीती रात उन्हेल रोड़ पर बाइक चालक ने टक्कर मारकर घायल कर दिया था। परिजन उसे उपचार के लिये जिला अस्पताल लाये और हड्डी वार्ड में भर्ती कराया। सुबह सतीश को उसके परिजन गोद में उठाकर सिटी स्कैन कराने ले जा रहे थे। उसके पिता भंवरलाल ने बताया कि हड्डी वार्ड से स्ट्रेचर पर गेट तक कर्मचारी लाये थे। यहां से 300 मीटर दूर सिटी स्कैन विभाग तक जाने के लिये कर्मचारियों ने कहा कि आटो में डालकर ले जाओ। आटो वाले सतीश को ले जाने को तैयार नहीं थे इस कारण उसे गोद में लेकर सिटी स्कैन विभाग तक जाना पड़ रहा है।
यह है नियम
अस्पताल के सभी वार्डों में वार्डबाय की ड्यूटी रहती है। नियमानुसार वार्डबाय ही मरीज को जांच के लिये स्ट्रेचर, व्हील चेयर पर लेकर जांच वाले विभाग तक लेकर जाते हैं और वापस वार्ड तक लाते हैं, लेकिन जिला चिकित्सालय में ऐसा नहीं होता। मरीज के परिजनों को जब उनकी जरूरत पड़ती है तो वह ड्यूटी पाइंट से नदारद हो जाते हैं। कोई मिल भी जाये तो वह बहाने बनाता है। पूर्व में भी इस प्रकार के मामले में सिविल सर्जन द्वारा पूछताछ किये जाने पर वार्डबाय ने जवाब दिया था कि मैं दूसरे मरीज को जांच कराने ले गया था, जबकि वह परिसर में बैठकर धुम्रपान कर रहा था।
मानवता के नाते भी नहीं करते मदद
वार्डों में पदस्थ सभी वार्डबाय को शासन द्वारा निर्धारित वेतन मिलता है और उनकी ड्यूटी है कि वह मरीजों की मदद करें, लेकिन उक्त लोग अपनी ड्यूटी ही ईमानदारी से नहीं करते। सतीश के पिता भंवरलाल का कहना था कि ड्यूटी नहीं मानवता के नाते ही मदद कर सकते थे, लेकिन इनमें तो मानवता नाम की चीज भी नहीं बची है।










