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एक दिन मुंह ढांकने से व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आएगा…

महाकाल मंदिर के प्रशासक पिछले दिनों सुर्खियों में रहे। अब तक मंदिर की अव्यवस्थाएं, अनियमिताएं, अनियंत्रित कर्मचारियों की मनमानी और असुरक्षा ही सुर्खियां बटोर रहीं थीं। चूंकि मामला व्यवस्था सुधारना और कमियां ढूंढने का था इसलिए मीडिया ने भी हाथों-हाथ लिया। महाकाल मंदिर में कुछ हो और चर्चा न हो, यह तो संभव ही नहीं है। मंदिर से दूर दीवार गिरी फिर भी देश में चर्चा मंदिर की ही हुई। मंदिर परिसर में केक कटा तो चर्चा-ए-आम हो गई।

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महाराष्ट्र के सीएम के बेटे ने अपने साथियों के साथ गर्भ गृह में दर्शन किए। मामला तूल पकड़ गया। वीडियो चलने लगे। प्रशासक गणेश धाकड़ अवकाश पर थे। अब जवाब कौन दे? पूरा मामला कलेक्टर पर ढोल दिया गया। सहायक प्रशासक मूलचंद जूनवाल ने कहा, गर्भगृह में अनुमति देने का हमें अधिकार ही नहीं है। जब कलेक्टर को पता चला कि भाई लोग अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं तब उन्होंने उस निरीक्षक के खिलाफ कार्रवाई की जो उस समय मौजूद था।

जूनवाल बोले, गलती निरीक्षक की थी। उसे देखना चाहिए था कि अनुमति है या नहीं। वह उन लोगों के बरगलाने में आ गया। खास बात यह भी है कि मंदिर में आजकल ऐसा ही हो रहा है। जहां कोई मुद्दा गर्माया कि कलेक्टर पर ढोल दिया जाता है। बहरहाल, इस गर्म मुद्दे पर बर्फ डालने के लिए कुछ न कुछ नया तो होना ही था। क्या हो जो चर्चा का विषय बने। वही हुआ जो एक समय उज्जैन में पदस्थ रहे कलेक्टर जीपी सिंघल किया करते थे।

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उज्जैन के बिगडै़ल लोगों, ब्याजखोरों, टेम्पो चालकों, बदमाशों को सबक सिखाने के लिए वेश बदल कर अपने कैबिन से बाहर निकल जाते थे। कभी टेम्पो में बैठ जाते तो कभी अस्पताल पहुंच जाते थे। उनका इतना खौफ हो गया था कि लोगों ने उन्हें गब्बर कहना शुरू कर दिया था। उनके किस्से बहुत मशहूर हुए। जनता में अपार लोकप्रियता अर्जित की। यह सबकुछ उन्होंने लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए नहीं, व्यवस्था सुधारनेे के लिए किया था।

स्कूल संचालकों का तो बुरा हाल हो गया था। दो सौ रुपए देकर पांच सौ रुपए के व्हाउचर पर हस्ताक्षर कराने वाले परेशानी में आ गए। एक स्कूल संचालक ने तो शहर की छोड़ दिया। उसी के स्कूल में पढ़ाने वाले एक शिक्षक उस स्कूल को चला कर स्कूल संचालक हो गए हैं। यानी कलेक्टर की कार्रवाई उनके लिए फलीभूत साबित हुई। अब वही वेश बदल कर महाकाल मंदिर के प्रशासक गणेश धाकड़ निकले हैं। एक ही बार निकले हैं।

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हड़कंप मचा है। जीपी सिंघल कई बार निकले थे। इनके हाथ में सिर्फ महाकाल मंदिर की व्यवस्था है, उनके पास पूरा जिला था। कलेक्टर कभी नहीं चाहते थे कि अखबारों में उनके फोटो प्रकाशित हो। उनके बाहर निकलने की खबर अपने पीए को भी नहीं होती थी। वे कार को दूर पार्क कर टेम्पो या ऑटो में अकेले बैठ जाया करते थे।

वह मास्क नहीं लगाते थे। कभी साफा पहन लेते तो कभी पूरा मुंह ही ढंक लेते थे। गणेश धाकड़ अपने साथी मूलचंद जूनवाल के साथ निकले। महाकाल मंदिर की अव्यवस्था को सुधारने के लिए उनके द्वारा उठाया गया यह कदम स्वागत योग्य है। खासतौर पर भस्मार्ती घालमेल का उजागर होना बहुत जरूरी है। अब तक इस संबंध में कई मामले सामने आ चुके हैं। भस्मार्ती में पंजीयन के बावजूद करीब ढाई सौ लोगों का न आना भी संदेह को जन्म देता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि भस्मार्ती के सौदागर उनके ही कार्यकाल में उजागर होंगे।

@नरेंद्र सिंह अकेला

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