रिश्तों में लगे हैं थकने, लेकिन क्या है कारण जान लें

हम आज के युवाओं को हम जेन-जी कहकर एक नाम दे देते हैं, जैसे इससे हम उनकी पूरी दुनिया समझ गए हों, लेकिन सच्चाई ये है कि ये सिर्फ कोई जनरेशन टैग नहीं हैं। ये हमारे अपने बच्चे और युवा हैं, जो एक बिल्कुल अलग माहौल में बड़े हो रहे हैं। बचपन से ही उन पर दबाव, तुलना, सोशल मीडिया, और उम्मीदों का बोझ पहले से कहीं ज्यादा रहा है। जब हम उन्हें सिर्फ एक नाम से पहचानते हैं, तो हम ये भूल जाते हैं कि हर युवा अपनी परिस्थितियों से बना एक अलग इंसान है। आज के युवा खुलकर अपनी बात रखते हैं, अपनी भावनाओं को समझते हैं और व्यक्त भी करते हैं।
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लेकिन इस समझ के पीछे एक सच्चाई छुपी है, कई युवा रिश्तों से ही थकने लगे हैं, ये थकान अचानक नहीं आती। ये धीरे-धीरे, बिना आवाज के जमा होती जाती है। ऐसा नहीं है कि आज के युवा रिश्तों को अहमियत नहीं देते। असल में समस्या ये है कि आज रिश्ते ऐसे माहौल में निभाए जा रहे हैं, जिसके लिए इंसानी मन और दिल कभी तैयार ही नहीं किए गए थे।
इमोशनल प्रेशर
भारत में करीब 37.7 करोड़ जेन जी युवा हैं, और इनमें से बहुत से ऐसे इमोशनल प्रेशर से गुजर रहे हैं, जो शायद पिछली पीढिय़ों ने कभी इस लेवल पर महसूस न किया हो। हाल की कई रिपोर्ट्स और स्टडीज इस बढ़ते तनाव की ओर इशारा करती हैं। एक स्टडी-2025 बताती है कि हर 10 में से 4 युवा अधिकतर समय तनाव या घबराहट महसूस करते हैं। वहीं आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, युवाओं की मानसिक सेहत से जुड़ी समस्याओं में साफ बढ़ोतरी देखी गई है, युवाओं से जुड़े मामलों में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी, आत्महत्या के खतरे में 22% का इजाफा, और कुल मिलाकर मानसिक बेचैनी में 17%की वृद्धि दर्ज की गई है। ये आंकड़े सिर्फ नंबर नहीं हैं, ये बताते हैं कि आज का युवा अंदर से कितना दबाव और अकेलापन झेल रहा है, भले ही बाहर से वह सामान्य और मजबूत दिखाई देता हो।
दूरी महसूस
जेन जी ऐसी दुनिया में बड़ी हुई है जहां बातचीत कभी रुकती ही नहीं। मैसेज तुरंत आ जाते हैं, जवाब जल्दी देने की उम्मीद होती है। अगर कोई देर से रिप्लाई करे तो सवाल उठने लगते हैं। हर वक्त ऑनलाइन रहना अब सामान्य माना जाने लगा है। धीरे-धीरे कनेक्शन तो बढ़ा, लेकिन रिश्तों की गहराई कम होती चली गई।
जब रिश्ते निभाना एक अभिनय लगने लगे
आजकल एक और बदलाव आया है-हर वक्त स्ट्रांग, कॉन्फिडेंट और सब ठीक है दिखाने का दबाव। अपनी कमजोरी दिखाना अब रिस्क लगता है। इसलिए कई युवा कूल, दूर-दूर या बेपरवाह बनने की कोशिश करते हैं। ऐसा इसलिए नहीं कि उन्हें फर्क नहीं पड़ता, बल्कि इसलिए क्योंकि खुलकर इमोशंस दिखाना उन्हें सेफ नहीं लगता। जब कोई इंसान अपने असली इमोशंस जाहिर करने से ज्यादा इस बात में एनर्जी लगाने लगे कि लोग उसे कैसे देख रहे हैं, तो रिश्ते आसान नहीं रह जाते।
आगे बढऩे का रास्ता
आज की युवा पीढ़ी के लिए आगे बढऩे का मतलब यह नहीं है कि रिश्तों में और ज्यादा मेहनत की जाए, बल्कि ये है कि रिश्तों के अंदर थोड़ा रुका जाए। असली कनेक्शन हर वक्त मौजूद रहने, परफेक्ट जवाब देने या इमोशंस का दिखावा करने से नहीं बनता। वह तब बनता है जब हम बीच-बीच में रुकना सीखें, ईमानदारी से बात करें और यह उम्मीद छोड़ दें कि हर रिश्ता हमारी हर इमोशंस की कमी पूरी करेगा। सच्ची भरपाई तब शुरू होती है जब युवा उन रिश्तों की तरफ लौटते हैं जो पहले से मौजूद हैं, जैसे परिवार, अपनी जड़ें और जाने-पहचाने रिश्ते। टूटे हुए हिस्सों से भागने के बजाय, उन्हें धीरे-धीरे समझने और संभालने की कोशिश करते हैं। जब मन की नींव मजबूत हो जाती है, तो बाहर के रिश्ते बोझ या थकावट नहीं लगते। इस पीढ़ी को ठीक करने, नाम देने की जरूरत नहीं है। इसे जरूरत है आजादी महसूस करने की, समझने के लिए समय और जैसा है वैसा रहने की इजाजत। तेज रफ्तार और शोर भरी दुनिया में सबसे गहरे और सच्चे रिश्ते उन्हीं के होंगे, जो रफ्तार से ज्यादा गहराई, दिखावे से ज्यादा मौजूदगी और चेहरे से ज्यादा सच को चुनते हैं।









