त्रिवेणी संयोग : वट सावित्री व्रत भी मनेगा 16 मई को

शनिश्चरी अमावस्या, शनि जयंती के संयोग के साथ रहेगा पर्वकाल
अक्षरविश्व न्यूज उज्जैन। 16 मई का दिन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होने जा रहा है। इस दिन ज्येष्ठ मास की अमावस्या पर शनिश्चरी अमावस्या और शनि जयंती के साथ ही वट सावित्री व्रत का दुर्लभ संयोग बन रहा है। सौभाग्य योग, भरणी और कृत्तिका नक्षत्र के इस विशेष मिलन में सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए वट वृक्ष का पूजन करेंगी, वहीं श्रद्धालु शनिदेव की आराधना कर दोषों से मुक्ति पाएंगे।
पं. विजय शर्मा ने बताया कि ज्योतिष गणना के अनुसार, अमावस्या तिथि की शुरुआत 16 मई को सुबह 5.11 बजे से होगी, जो रात्रि 1.30 बजे समाप्त होगी। इस प्रकार पर्वकाल की कुल अवधि 21 घंटे 41 मिनट रहेगी। प्रात: पूजन मुहूर्त सुबह 7.12 बजे से 8.54 बजे तक, अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11.50 बजे से 12.45 बजे तक रहेगा। पूजन का विशेष योग सुबह 10.26 बजे तक सौभाग्य योग रहेगा, जिसके बाद शोभन योग प्रारंभ होगा। ये दोनों ही योग अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ माने जाते हैं।
यमराज से जुड़ी है कथा
धार्मिक मान्यता है कि वट (बरगद) वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का वास होता है। पौराणिक कथा के अनुसार, पतिव्रता सावित्री ने इसी दिन वट वृक्ष के नीचे अपने दृढ़ संकल्प और धर्म से यमराज को प्रसन्न कर पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। तभी से महिलाएं पूजन सामग्री सजाकर वट वृक्ष की परिक्रमा करती हैं और कच्चे सूत को तने पर लपेटकर पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। व्रतधारी महिलाएं सुबह स्नान के बाद सोलह शृंगार कर लाल या पीली साड़ी धारण करेंगी। वट वृक्ष के नीचे जल अर्पित कर हल्दी, कुमकुम, अक्षत और पुष्प से पूजन किया जाएगा। इसके बाद वृक्ष की 7, 11, 28 या 108 बार परिक्रमा कर रक्षा सूत्र बांधा जाएगा। व्रत का पारणा अगले दिन भीगे हुए चने खाकर किया जाएगा।
शनि जयंती पर दान-पुण्य का महत्व- शनिश्चरी अमावस्या और शनि जयंती एक साथ होने से इस दिन का महत्व कई गुना बढ़ गया है। शनि दोष, साढ़ेसाती और ढैया से पीडि़त जातकों के लिए इस दिन शनिदेव का तेलाभिषेक और काले तिल, वस्त्र व अन्न का दान करना विशेष फलदायी रहेगा। कई समाजों में महिलाएं तीन दिवसीय वट सावित्री व्रत की शुरुआत 14 मई से ही कर देंगी।









