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तीन दिन में सवा सौ स्लीपर बसों पर कार्रवाई, 800 से अधिक लॉक

एक भी स्लीपर बस सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की गाइड लाइन के मुताबिक नहीं

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अक्षरविश्व न्यूज उज्जैन। स्लीपर बसों में यात्रियों की जान से हो रहे खिलवाड़ को लेकर आरटीओ अमला सख्त हो गया है। लगातार तीसरे दिन की गई सघन जांच में सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ती मिलीं।

रविवार को नानाखेड़ा बस स्टैंड और उन्हेल रोड चौराहे पर की गई कार्रवाई के दौरान एक भी बस में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की गाइड लाइन के मुताबिक नहीं पाई गई। शनिवार को 52 में से 37 बसें नियमों के विरुद्ध सड़कों पर दौड़ती मिली। रविवार सुबह से चैकिंग अभियान शुरू हो गया था।

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तीन दिनों में सवा सौ से अधिक स्लीपर बसों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। वहीं 800 से अधिक बसों को कंप्यूटर पर लॉक किया गया है। उज्जैन जिले में पंजीकृत सभी 838 स्लीपर बसों के संचालकों को नोटिस जारी करते हुए विभाग ने इन्हें कंप्यूटर सिस्टम में लॉक कर दिया है। इन बसों का लॉक तभी खुलेगा जब ये मापदंड के मुताबिक परिवर्तन कराएंगे। रविवार को शहर में चार जगह आरटीओ की टीम बसों की जांच में जुटी रही।

लॉक होने का क्या मतलब है?
एक बार बस का डेटा कंप्यूटर सिस्टम में लॉक होने के बाद बस का संचालन वैधानिक रूप से असंभव हो जाएगा। दस्तावेज नहीं बनेंगे यानी बस का फिटनेस, परमिट और बीमा रिन्यू नहीं हो पाएगा। टोल नाके से गुजरते ही बस का स्टेटस लॉक दिखेगा, जिससे तत्काल कार्रवाई हो सकेगी। संचालक को बस आरटीओ कार्यालय लाकर चैक करवानी होगी। यदि बस किसी दूसरे जिले में है, तो वहां के आरटीओ से उज्जैन विभाग को रिपोर्ट भेजनी होगी।

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मानकों पर खरी उतरी तभी खुलेगा लॉक
आरटीओ संतोष मालवीय ने स्पष्ट किया है कि अभी 838 बसों को नोटिस देकर लॉक किया गया है। संचालकों को सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के बॉडी कोड कंडक्ट के तहत बस की जांच करानी होगी। बस मानकों पर फिट पाई गई, तभी सिस्टम से लॉक हटाया जाएगा। कमियां मिलने पर उन्हें पहले दुरुस्त करना अनिवार्य होगा।

स्लीपर बसों में सुरक्षा की गंभीर खामियां सामने आई

एआईएस-052 बस बॉडी कोड, यह एक अनिवार्य मानक है जो बस के डिजाइन और ढांचे की मजबूती तय करता है। 1 सितंबर, 2025 से इसे लागू किया गया है। केवल ऑटोमोबाइल कंपनियां या केंद्र सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त बॉडी बिल्डर ही स्लीपर बसें बना सकते हैं, जिससे सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित हो सके, लेकिन बस मालिकों ने अपनी सुविधा मुताबिक बॉडी बनवाई। ताकि सीटें व स्लीपर की संख्या बढ़ा सकें। ऐसे में इमरजेंसी गेट और बस में आने जाने का रास्ता संकरा हो गया।

स्लीपर बसों में 4 इमरजेंसी गेट (आपातकालीन द्वार) होना चाहिए। छत पर भी दो इमरजेंसी निर्गम होना चाहिए। लेकिन बसों में इमरजेंसी गेट के आगे स्लीपर सीटें लगा दी गई थीं।

लोअर बर्थ की ऊंचाई फ्लोर से 300350 एमएम और ऊपरी बर्थ के लिए 800एमएम न्यूनतम होना चाहिए। जो किसी बस में नहीं मिली।

 फायर डिटेक्शन और अलार्म सिस्टम बंद मिले। नियमों के मुताबिक बस में १० किलो का फायर सेफ्टी सिस्टम होना चाहिए। बसों में १ या २ किलो के ही मिले।

इमरजेंसी लाइटिंग और रेट्रोफिट करना जरूरी।

ड्राइवर अलर्ट सिस्टम नदारद थे। सिस्टम नींद या ऊंघने पर ड्राइवर को अलर्ट करता है।

बस में आने-जाने का रास्ता 450 एमएम होना चाहिए। 250 से 300 एमएम के बीच मिला।

 व्हीलबेस और सीटों की ऊंचाई-चौड़ाई में भी तकनीकी गड़बड़ी मिली।

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