अब हर साल बदलेंगे बिजली रेट

आम उपभोक्ताओं से कम रेट के लिए उद्योगों से ज्यादा रेट लेने की व्यवस्था बदलेगी
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बिजली मंत्रायल ने ड्राफ्ट नेशनल इलेक्ट्रिसिटी पॉलिसी 2026 जारी की
नईदिल्ली, एजेंसी। बिजली मंत्रालय ने ड्राफ्ट नेशनल इलेक्ट्रिसिटी पॉलिसी 2026 जारी कर दी है। इसमें कहा गया कि बिजली की दरों में एक इंडेक्स के आधार पर ऑटोमैटिक रूप से सालाना तौर पर बदलाव होगा। ड्राफ्ट पॉलिसी में मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर और रेलवे से जुड़ी क्रॉस-सब्सिडीज को खत्म करने से लेकर रिन्यूएबल एनर्जी को बढ़ावा देने तक कई सुधारों की बात की गई है। मौजूदा पॉलिसी लागू होने के करीब 20 साल बाद जारी नई पॉलिसी के ड्राफ्ट में बिजली की दरों के बारे में कहा गया, टैरिफ्स में सालाना तौर पर ऑटोमैटिक तरीके से बदलाव के लिए एक उचित इंडेक्स से जोड़ा जाएगा। अगर स्टेट कमीशन कोई टैरिफ ऑर्डर जारी न करे, तो यह काम करेगा। इसमें कहा गया कि टैरिफ कंपोनेंट्स और उपभोक्ताओं की तमाम श्रेणियों के बीच क्रॉस सब्सिडाइजेशन से बचने के लिए ऐसी व्यवस्था बनेगी, जिसमें डिमांड चार्जेज के जरिए फिक्स्ड कॉस्ट रिकवर होती रहें।
क्रॉस सब्सिडाइजेशन
क्रॉस सब्सिडाइजेशन का मतलब यह है कि उद्योगों और रेलवे जैसे उपभोक्ताओं को बिजली ज्यादा रेट पर दी जाती है जिससे आम उपभोक्ताओं और किसानों को कम दरों पर दी जा रही बिजली की लागत की भरपाई हो सके। ड्राफ्ट में मैन्युफेक्चरिंग इंडस्ट्री, रेलवे और मेट्रो रेलवे पर सरचार्ज और क्रॉस सब्सिडी का बोझ हटाने की बात कही गई। ड्रॉफ्ट पॉलिसी लाने के बारे में मंत्रालय ने कहा, डिस्ट्रिब्यूशन सेगमेंट में नुकसान और कर्ज की चुनौती बनी हुई है।
6.9 लाख करोड़ घाटे में
डिस्ट्रिब्यूशन कंपनियां करीब 6.9 लाख करोड़ रुपए के घाटे में हैं और उन पर 7.18 लाख करोड़ रुपए का कर्ज बकाया है। परमाणु क्षेत्र से जुड़े स्॥्रहृञ्जढ्ढ एक्ट 2025 के प्रावधानों के अनुसार, ड्रॉफ्ट में अत्याधुनिक न्यूक्लियर टेक्नॉलाजी अपनाने, मॉड्यूलर रिएक्टर डिवेलप करने और छोटे रिएक्टर स्थापित करने पर जोर देने के साथ कहा गया कि वाणिज्यिक और औद्योगिक उपभोक्ताओं के बीच परमाणु ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा दिया जाएगा।
अभी विद्युत नियामक तय करते हैं रेट
बिजली रेट अभी विद्युत नियामक आयोग तय करते हैं। इसके लिए विद्युत वितरण कंपनियां एक तय रेट नियामक आयोग को भेजती हैं। यह रेट विद्युत निर्माण उसके ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन लागत पर आधारित होते हैं। आयोग रेट की तुलना महंगाई की दर से करता है और जनसुनवाई कर एक निश्चित दर तय करता है। अक्सर यह दर वितरण कंपनियों द्वारा दिए जाने वाले प्रस्ताव की तुलना में थोड़ी कम होती है। हालांकि लागत और बाजार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश इनमें होती है। इस वजह से दाम 5 से 10 फीसदी की दर से बढ़ते हैं। नई व्यवस्था बाजार के मुताबिक चलेगी। यानी लागत से बिजली की कीमतों का निर्धारण होगा। ऐसे में उपभोक्ताओं को दाम में राहत कम मिलने की संभावना रहेगी। हालांकि घरेलू उपभोक्ताओं के मामले में सरकार सब्सिडी का प्रोविजन कर सकती है। औद्योगिक उपभोक्ताओं को भी राहत दी जा सकती है।








