डेटिंग ऐप्स पर तेजी से बढ़ा ‘पफर फिशिंग’ ट्रेंड, जानिए कैसे लोग बन रहे शिकार

मोबाइल और सोशल मीडिया ने जिस तरह से इंसानी रिश्तों को बदल दिया है वह किसी से छिपा नहीं है। पहले लोग आमने-सामने बैठकर एक-दूसरे को समझते थे, उनकी आदतें जानते थे और फिर रिश्ता बनाते थे। लेकिन आज अधिकतर पहचान ऑनलाइन होती है और इसी ऑनलाइन दुनिया में हर कुछ समय बाद रिश्तों से जुड़ा कोई नया चलन सामने आता रहता है। इन दिनों एक नया शब्द तेजी से चर्चा में है जिसे “पफर-फिशिंग” कहा जा रहा है। सुनने में यह भले ही अजीब लगे लेकिन इसका संबंध दिखावे और झूठी छवि की उस दुनिया से है जो आज लाखों लोगों की जिंदगी में घर कर चुकी है।
आखिर क्या है यह पफर-फिशिंग
पफर-फिशिंग का सीधा मतलब है खुद को असलियत से कहीं ज्यादा बेहतर, आकर्षक और सफल दिखाना। सोशल मीडिया या रिश्ते बनाने वाले ऐप्स पर ऐसे बहुत से लोग मिलते हैं जो बहुत ज्यादा बदली हुई और सजी-संवरी तस्वीरें डालते हैं। कुछ लोग अपनी जिंदगी को जरूरत से कहीं ज्यादा शानदार बनाकर पेश करते हैं ताकि सामने वाला उनसे प्रभावित हो जाए। इस शब्द का नाम एक खास समुद्री मछली “पफर फिश” से लिया गया है जो खतरा महसूस होने पर खुद को फुलाकर बड़ी और डरावनी दिखने लगती है। ठीक उसी तरह कुछ इंसान भी ऑनलाइन दुनिया में खुद को असली से कहीं ज्यादा खास और प्रभावशाली दिखाने की कोशिश करते हैं।
लोग ऐसा करते क्यों हैं
इस चलन के पीछे सबसे बड़ी वजह है हर किसी की यह चाहत कि लोग उसे पसंद करें और उसकी तारीफ हो। इसीलिए कई लोग अपनी कमियों पर पर्दा डालकर सिर्फ अच्छी और चमकदार बातें सामने रखते हैं। बहुत से लोगों के मन में यह डर घर कर जाता है कि अगर उन्होंने अपनी असली तस्वीर या सच्ची जिंदगी दिखाई तो शायद कोई उन्हें अपनाएगा नहीं। दूसरों की सजी-धजी और रंगीन जिंदगी देखकर भी लोगों में वैसा ही दिखने की होड़ लग जाती है। धीरे-धीरे यह आदत में बदल जाता है और इंसान खुद अपनी असली पहचान से दूर होता चला जाता है।
रिश्तों पर कितना गहरा पड़ता है असर
शुरुआत में यह सब बेहद साधारण लगता है लेकिन जैसे-जैसे सच्चाई सामने आती है रिश्तों में दरारें पड़ने लगती हैं। जब सामने वाला इंसान असलियत देखता है तो उसे गहरी ठगी का एहसास होता है। यह एहसास भरोसे को तोड़ देता है और रिश्ते की नींव कमजोर पड़ जाती है। कई बार लोग अपनी तस्वीर, नौकरी, आदतें और जीवनशैली तक बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। लेकिन सच कभी लंबे समय तक छिपा नहीं रहता और यही झूठ आगे चलकर रिश्तों में स्थायी दूरी पैदा कर देता है।
क्या यह पूरी तरह झूठ माना जाए
पफर-फिशिंग में लोग पूरी तरह नकली पहचान नहीं बनाते बल्कि अपनी असली छवि को जरूरत से ज्यादा चमकाकर पेश करते हैं। इंसान असली होता है लेकिन उसकी ऑनलाइन छवि हकीकत से काफी अलग होती है। यही कारण है कि बहुत से लोग इसे एक छोटा सा झूठ मानते हैं लेकिन इसका असर रिश्तों पर बेहद गहरा पड़ता है। रिश्तों की असली ताकत हमेशा सच्चाई और भरोसे में होती है। खुद को अच्छा दिखाने में कोई बुराई नहीं है लेकिन जरूरत से ज्यादा दिखावा आगे चलकर खुद के लिए ही मुसीबत बन जाता है। इसीलिए हमेशा अपनी सच्ची पहचान के साथ लोगों से जुड़ना ही समझदारी और बेहतरी की राह है।









