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अनुमोदना का फल भी स्वर्ग सुख की ही प्राप्ति है….

रयणसार ग्रंथ की प्रवचन माला के दौरान मुनिश्री ने कहा

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अक्षरविश्व न्यूज. उज्जैन दान का साक्षात फल स्वर्ग मोक्ष की प्राप्ति है तो अनुमोदना का फल भी स्वर्ग सुख की ही प्राप्ति है। लेकिन अनुमोदना वे करें जो असमर्थ हैं, देने की शक्ति जिनके पास नहीं है, जो किसी अपरिहार्य कारण से आहारदान करने के लिए अयोग्य हैं। एक छोटा सा बालक था उसने आहारदान की अनुमोदना की और वह उस अनुमोदना के फल से साक्षात स्वर्ग में उत्पन्न हुआ।

वहां के सुख को भोगकर इसी उज्जैनी में सेठ धनपाल के यहां धन्यकुमार नाम का पुत्र होकर उत्तम सुख को प्राप्त किया। श्रेष्ठ तो यही है कि दान स्वयं अपने हाथ से ही दें और यदि नहीं दे पा रहे हैं तो दूसरे को देने के लिए सहयोग करें और यदि सहयोग भी नहीं कर पा रहे हैं तो कम से कम देने वालों की अनुमोदना तो अवश्य ही करें। क्योंकि अच्छे कार्य की अनुमोदना ही संसार के सुखों का कारण अवश्य ही बनती है।

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यह बात मुनिश्री सुप्रभसागरजी महाराज ने श्री आदिनाथ दि. जैन मंदिर ऋषिनगर में चल रही रयणसार ग्रंथ की प्रवचन माला के दौरान कही। मुनिश्री ने कहा कि सुपात्र के बिना दान वैसे ही निष्फल है जैसे सुशील पुत्र के बिना बहुत धन धान्य, संपत्ति निष्फल है क्योंकि यदि संतान सुशील नहीं है

तो धन संपत्ति कितनी भी क्यों न हो वह सब नष्ट कर देगा। वैसे ही बहुत सा दान दिया लेकिन यदि वह सुपात्र को नहीं दिया तो वह संसार भ्रमण का ही कारण बनेगा। इसलिए कहा भी जाता है कि पूत कपूत तो का धन संचय और पूत सपूत तो का धन संचय। भावों के बिना जैसे व्रत, गुण और चरित्र निष्फल है वैसे ही सुपात्र के बिना दान भी निष्फल ही जानना चाहिये और यदि सुपात्र को हम दान नहीं भी दे पा रहे हैं मात्र अनुमोदना ही कर रहे हैं तो वह भी स्वर्ग के लिए साधन बनेगी। यह जानकारी मीडिया प्रभारी प्रदीप झांझरी ने दी।

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