Saturday, December 9, 2023
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उज्जैन जिले में वुमन पॉलिटिक्स का स्टेटस

कांग्रेस में विधायक, भाजपा में महापौर तक सीमित

शैलेष व्यास|उज्जैन। महिलाओं को राजनीति में 33 प्रतिशत आरक्षण चर्चा में है। कब से लागू होगा यह तय नहीं है। हालांकि, इंदौर सहित मालवा-निमाड़ में कई महिलाओं को 70 साल में कई मौके मिले, लेकिन इक्का-दुक्का ही राजनीति में छाप छोड़ पाईं हैं।

कई महिलाएं ऐसी भी हैं, जिन्हें राजनीतिक परिवार का होने से मौके मिलते रहे। आरक्षण के बाद नए चेहरों को मौका मिलने की बात सभी पार्टियों के नेताओं ने कही है,लेकिन पूर्व के वर्षों का इतिहास देखा जाए तो कांग्रेस में महिलाएं विधायक के पद तक पहुंची है,लेकिन भाजपा में महापौर से आगे बात नहीं बनी। हालांकि दोनों ही दल ने उज्जैन संसदीय क्षेत्र से एक बार भी किसी महिला को मौका नहीं दिया। महापौर का पद भी आरक्षित होने के कांग्रेस-भाजपा की महिलाओं को महापौर बनने का अवसर मिला है।

पहली विधायक: हंसा बेन

हंसा बेन ने 1962 में कांग्रेस के टिकट पर उज्जैन दक्षिण से चुनाव लड़ा जीती। वे जिले से पहली महिला विधायक बनी। हालांकि मालवा-निमाड़ की बात करें तो 1957 में जोबट (झाबुआ) से गंगाबाई ने चुनाव लड़ा और जीती। वे पहली आदिवासी विधायक बनीं। इसी साल में रतलाम से सुमन जैन और कन्नौद-देवास जिले से मंजुलाबाई वाघले भी जीती। तीनों कांग्रेस की विधायक थी। उज्जैन जिले में विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने सात बार महिलाओं को मौका दिया,जिसमें से चार बार सफलता मिली है। भाजपा ने अभी तक किसी भी महिला को विधानसभा चुनाव में अवसर नहीं दिया है।

कांग्रेस से तीन और भाजपा की दो महापौर

नगर निगम उज्जैन में पांच महिला महापौर रही है। इसमें कांग्रेस से तीन और भाजपा से दो महिलाएं महापौर रही है। महापौर का पद महिला के लिए आरक्षित होने पर कांग्रेस से इंदिरा त्रिवेदी, शीला क्षत्रिय और सोनी मेहर महापौर रही है। वही भाजपा की ओर से अंजू भार्गव, मीना जोनवाल उज्जैन की महापौर रही।

जिला पंचायत में दो बार अध्यक्ष

पंचायती राज व्यवस्था में आरक्षण के प्रावधानों के चलते उज्जैन जिला पंचायत में दो बार अध्यक्ष का पद महिला के लिए आरक्षित रहा है। इसमें दोनों ही भाजपा की ओर जिला पंचायत अध्यक्ष बनी। कांग्रेस को एक भी बार अवसर नहीं मिला।

परुलेकर जो देश-प्रदेश में छा गई

उज्जैन की राजनीति में महिलाओं की सक्रियता की बात करें,तो डॉ.कल्पना परुलेकर अपनी कार्यशैली, तेवर, राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस, समाजवादी और अन्य दलों के नेताओं से संपर्क के कारण देश-प्रदेश में छाई रही। सत्तारूढ़ दल की विधायक रहते भी परुलेकर ने अधिकारियों और सरकार को हमेशा निशाने पर रखा। कई विषय और मुद्दों को लेकर परुलेकर ने सरकार को कई बार परेशानी में डाल दिया। परुलेकर ने महिदपुर से 1993 में चुनाव लड़ा और हारी। 1998 में पहली बार विधायक बनी। 2003 में पार्टी ने टिकट नहीं दिया,तो निर्दलीय मैदान में उतरी,लेकिन हार गई। 2008 में फिर टिकट मिला और जीती।

हंसा बेन: 1962 में कांग्रेस के टिकट पर उज्जैन दक्षिण से चुनाव लड़ा जीती। 1967 में कांग्रेस के टिकट पर उज्जैन उत्तर से चुनाव लड़ा हारी।

प्रीति भार्गव: 1998 में उज्जैन दक्षिण सीट से कांग्रेस की विधायक बनी लेकिन अगला चुनाव 2003 में हार गई।

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