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क्या होगा वशिष्ठ परिवार का राजनीतिक भविष्य…?

अलग-अलग चर्चा और अनुमान, जितने मुंह-उतनी बात

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उज्जैन। प्रदेश और जिले की प्रतिष्ठित-चर्चित वशिष्ठ परिवार की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक धरोहर में दरार आने के बाद परिवार के राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चा होने लगी है। ऐसा इसलिए क्योंकि उज्जैन ही नहीं प्रदेश में कांग्रेस के संगठन और सत्ता में एमपी वशिष्ठ का बड़ा वजूद रहा।

एमपी यानि महावीरप्रसाद वशिष्ठ जब तक सक्रिय थे,तब तक उनके माध्यम से इस परिवार की लगभग हर क्षेत्र में तूती बोलती थी। अब जबकि एमपी राजनीति से दूर है और उनके एम्पायर को लेकर विवाद सामने आ गया है,तो राजनीति में दखल रखने वाले लोगों के अलग-अलग अनुमान है। एमपी वशिष्ठ कांग्रेस के शीर्ष नेता अजुर्नसिंह के खास समर्थकों में शामिल रहे और दिग्विजयसिंह जैसे नेताओं का साथ भी मिला।

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एमपी वशिष्ठ उज्जैन दक्षिण से दो बार (1980 और 1985) में विधायक रहें। अजुर्नसिंह राष्ट्रीय राजनीति में चले गए तो एमपी ने दिग्विजयसिंह का हाथ थामे रखा। कांग्रेस के प्रदेश संगठन में पदाधिकारी रहते सत्ता-संगठन की चाबी पर नियंत्रण रखा। कम से कम उज्जैन संभाग-जिले में कोई फैसला एमपी वशिष्ठ की रायशुमारी के बगैर नहीं होता था। हर प्रशासनिक-राजनीतिक निर्णय पर एमपी वशिष्ठ की छाप नजर आती थी।

10 साल शेडो सीएम, सुपर सीएम

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1993 में कांग्रेस के सत्ता में आने और दिग्विजयसिंह के सीएम बनने के बाद एमपी वशिष्ठ का कांग्रेस के संगठन और प्रदेश की सत्ता में अघोषित तौर एकछत्र राज रहा। लोग तो एमपी वशिष्ठ को शेडो सीएम, सुपर सीएम तक बोलते थे। 2003 में कांग्रेस के चुनाव हारने पर दिग्विजयसिंह के संकल्प (15 साल तक कोई चुनाव नहीं लडऩे-पद नहीं लेने) ने एमपी वशिष्ठ को कांग्रेस की राजनीति में नेपथ्य की राह पर ला दिया। 2003 के बाद के कुछ वर्षों तक उज्जैन में वशिष्ठ का दबदबा रहा। 88 वर्षीय वशिष्ठ अब राजनीति से लगभग दूर है। परिवार का कलह भी सामने आ गया है। यह सवाल लाजमी है कि राजनीतिक में वशिष्ठ परिवार के भविष्य क्या…?

आगे क्या…?

कभी कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे एमपी वशिष्ठ ने अपने बेटे प्रवीण वशिष्ठ ‘पप्पूÓ पर एमआईटी में अनियमितता करने के आरोप लगाए । इसके बाद तो उज्जैन की राजनीति में आंतरिक तौर पर तो भूचाल आ गया है। प्रवीण वशिष्ठ राजनीति में भले सक्रिय नहीं हो, लेकिन बीते कुछ दिनों में उनकी कांग्रेस की विपरीत विचारधारा वाले संगठन से नजदीकियां बढ़ी है। प्रवीण और उनके पुत्र आदित्य ने ऐसे संगठन में मंच शेयर किए है। वहीं एमपी वशिष्ठ के दूसरे पुत्र राजेंद्र ‘राजूÓ वशिष्ठ कांग्रेस में हैं। वैसे एक बार वे कांग्रेस से बगावत कर चुके है।

वहीं 2018 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर भी चुनाव हार गए थे। वशिष्ठ के कुल का कलह घर की चारदीवारी से निकल कर बाहर आ गया है। दिग्विजयसिंह के लिए महावीरप्रसाद वशिष्ठ का विशेष महत्व है। प्रवीण वशिष्ठ के कांग्रेस की विपरीत विचारधारा वाले संगठन से जुडऩा और अब परिवार का विवाद आने के बाद दिग्विजयसिंह की निगाह में वशिष्ठ परिवार का कितना महत्व होगा, परिवार को कांग्रेस की राजनीति में कितनी तवज्जों मिलने वाली है यह तो वक्त की बताएगा।

‘ऐसे को चुनाव संचालक बनाया जो खुद नहीं जीते’

जानकारों का कहना है कि दिग्विजयसिंह राजनीतिक तौर पर उसी की मदद करेंगे, जो एमपी वशिष्ठ को महत्व देंगे। फिर वह पप्पू हो या राजू या वशिष्ठ परिवार..। दिग्विजयसिंह के लिए महावीरप्रसाद वशिष्ठ का जो स्थान है वह वशिष्ठ परिवार में किसी के लिए नहीं है। वैसे देखा जाए तो शायद वशिष्ठ परिवार में राजनीतिक तौर पर एमपी वशिष्ठ को प्राथमिकता नहीं मिलती है। यह अनुमान एमपी वशिष्ठ की बात से लगाया जा सकता है। बीते दिनों एमपी वशिष्ठ ने अपने पुत्र प्रवीण वशिष्ठ के संबंध में चर्चा के लिए मीडियाकर्मियों का आमंत्रित किया था। एमपी वशिष्ठ से पूछा गया कि आप राजनीति के माहिर खिलाड़ी रहे। कई को चुनाव हरवा दिया। फिर भी आपके बेटे राजेंद्र वशिष्ठ दो विधानसभा चुनाव हार गए। इसके जवाब में एमपी वशिष्ठ ने कहा था कि एक चुनाव की छोड़ो…।

दूसरे चुनाव की बात करें, उसमें तो मुझे एक कमरे में बैठा दिया था। चुनाव संचालक भी ऐसे नेता को दिया, जो कभी चुनाव जीता नहीं…उसकी नेतागिरी का सभी को पता है। कमजोर चुनाव संचालक बनाने पर कैसे चुनाव जीत सकते थे। आगे राजू भैय्या को टिकट दिलाने या चुनाव लड़ाने कि बात पर वशिष्ठजी केवल मुस्कुरा दिए…। बता दें कि बीते दिनों मीडियाकर्मियों से बात करते हुए महावीर प्रसाद वशिष्ठ ने बताया था कि उनके द्वारा स्थापित संस्था प्रसार शिक्षण एवं सेवा संस्थान के अधीन संचालित एमआईटी ग्रुप उज्जैन का व्यावसायिक तौर पर विभाजन कर दिया हैं। वशिष्ठ ने अपने पुत्र प्रवीण वशिष्ठ पप्पू पर आरोप भी लगाए थे।

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