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अक्षरविश्व के लिए पर्युषण पर्व पर मुनिश्री सुप्रभसागजी की कलम से’

पर्युषण पर्व पर विशेष

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उत्तम मार्दव धर्म : विनम्रता और मृदुता से भरा व्यक्ति महान होता है

पूर्व जन्म के तीव्र पुण्योदय के कारण जीव ने यह दुर्लभ मनुष्य पर्याय प्राप्त की तो विरासत में यह मान कषाय भी प्राप्त की क्योंकि हमने पहले ही समझा था कि चार कषायों के कारण जीव ने चार गतियां प्राप्त की। जिनमें कारण अनंत संसार में परिभ्रमण करना पड़ा। मनुष्य में मुख्यता से जीव को मान कषाय प्राप्त होती है।

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जो मुनि कुल जाति, रुप, बुद्धि, तप, ज्ञान, शील ऋद्धि का मद नहीं करता उसके ही यह उत्तम मार्दव धर्म होता है। संसारी व्यक्ति कुल, रूप, जाति ज्ञान, पूजा आदि के मद में मदमस्त होकर अनेक दुर्योनियों में भटकता हुआ दु:ख को ही प्राप्त करता है। जिसको मोक्ष का साक्षात द्वार हमारे पूर्वोचार्यों ने कहा है उसका नाम विनय है, मार्दव है और मार्दव धर्म को प्राप्त करने के लिए मान को गलाना अति आवश्यक है।

मार्दव धर्म को वही प्राप्त हो सकता है जिसने मान, मद, अहंकार, घमंड को मार दिया है। ”बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खूजन, पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।” वास्तव में बड़ा व्यक्ति वही होता है तो विनम्रता, मृदुता से भरा होता है। बड़प्पन की सार्थ बड़े होने में ही है लेकिन खजूर जैसा बड़ा होना किसी भी प्रकार से कार्यकारी नहीं है। बहुत बड़ा वृक्ष झुकना नहीं जानता वह समूल नष्ट हो जाता है और घास जो झुकना जानती है वह आंधी-तूफान में भी स्वयं को सुरक्षित करती है।

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मान को जीतना है तो विनय गुण को प्राप्त करना अति आवश्यक है। वर्तमान के इंसान को प्रत्येक कार्य में सम्मान की आकांक्षा होती है, दान भी देता है तो नाम के लिए देता है लेकिन नाम के लिए दिया गया दान दुर्गति का ही साधन बनता है। अहंकारी की स्थिति बिल्कुल खेत में खेड़-बिजुके की तरह होती है जैसे एक जब देखता है कि खेत की फसल पकने वाली होती है तो किसान खेत एक मनुष्य के आकार के पुतल (बिजूके) को खड़ कर देता है तो न तो एक भी दाना खाता है न हि दूसरे किसी को खाने देता है, अहंकारी की परणति भी ऐसी ही होती है वह न तो स्वयं कोई कार्य करता है और न हि किसी दूसरे को करने देता है क्योंकि मुझे क्यों नहीं पूछा।

”अहं करोति इति अहंकार:” मैं करता, मैं कर्ता ये कर्तव्य भाव ही इंसान के अहंकार का जनक है और जिसने उस अहंकार को जीत लिया वही मार्दव धर्म को प्राप्त करके अपनी आत्मा का कल्याण कर लेता है। गणधर परमेष्ठी भ्ीा जो कि त्रेसठ ऋद्धि के धारक हैं, अंत र्मुहूर्त में पूरे द्वादशांग का पाठ कर लेते हैं, वे भी तीर्थंकर भगवान के समवशरण में विनय भाव से हाथ जोड़कर खड़े होते हैं और उनका यह विनय गुण ही उन्हें भगवान बना देता है।

आठ प्रकार के मद से रहित होकर जो व्यक्ति मुदु गुण को अपने हृदय में धारण करता है उसके ही यह मार्दव गुण होता है और जो निग्र्रंथ मुनि मान, अपमान में समता भाव को धारण करता है, उनके ही यह उत्तम मार्दव धर्म प्रकट होता है।

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