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अक्षरविश्व के लिए पर्युषण पर्व परमुनिश्री सुप्रभसागजी की कलम से’

‘आत्मा स्वभावं, परभाव भिन्नं’ का बोध कराए जो, वह उत्तम आकिंचन्य धर्म है…

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पर्युषण महापर्व में दसलक्षण पर्व की शुरुआत हो गई है। इस मौके पर अक्षरविश्व के विशेष आग्रह पर मुनिश्री सुप्रभसागर जी की लेखनी से पर्वराज पर्युषण और दसलक्षण पर्व की विशेष प्रवचन माला प्रकाशित की जा रही है….

किंचित भी अन्य मेरा नहीं, ये भाव ह्रदय में जागृत जब होता है तब ही उत्तम आकिंचन्य धर्म प्रकट होता है। ‘यह मेरा है, मैं इसका हूं, ये मेरा था, मैं इसका होऊंगा’ जब तक ये संकल्प-विकल्प रूप परिणाम चल रहे हैं तब तक आकिंचन्य धर्म की प्राप्ति संभव नहीं है। जहां-जहां मूर्छा भाव है, परद्रव्यों में ममत्व है, वहर परिग्रह ही है। परिग्रह के अभाव में ही आकिंचन्य धर्म प्राप्त हो सकता है। परिग्रह चिंता का कारण है, जब तक धन, वैभव संपत्ति, पुत्र-मित्र, परिजन प्राप्त नहीं होते तब तक चिंता प्राप्त होने पर उसके संरक्षण की चिंता और अंत में नष्ट हो जाने की चिंता सताती है, इसलिए परिग्रह की चिंता, उसकी प्राप्ति का चिंतन दु:ख का ही कारण है जो दुर्गति में ही ले जाने वाला है।

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जहां अंतरंग में तृष्णा का भाव है, वहां नियम से परिग्रह है और वह परिग्रह नरक-निगोद में ही ले जाने वाला है। थोड़ा-सा परिग्रह भी दु:ख का कारण बन जाता है। उस परिग्रह के चौदह भेद जिनागम कहे गए हैं। जो श्रावक इस चौदह प्रकार के अंतरंग-बहिरंग परिग्रह को त्याग करके निर्विकल्प अवस्था को प्राप्त कर लेता है ऐसे उस निग्र्रंथ मुनि को उत्तम आकिंचन्य धर्म प्राप्त होता है। छोटी सी फांस, छोटा-सा कांटा भी यदि पैर में लग जाए तो जब तक वह निकल नहीं जाता तब तक कष्ट प्राप्त होता है और जैसे ही कांटा निकल गया व्यक्ति एक अनूठी सुख-शांति की अनुभूति करता है।

ज्ञानी जीव ममत्व भाव में लीन नहीं होता, वह ममत्व भाव को छोड़कर निर्ममत्व भाव को प्राप्त करते हुए उत्तम अकिंचन धर्म को प्राप्त करने का पुरुषार्थ करता है जबकि अज्ञानी सोचता है कि जगत के जितने भी पदार्थ हैं वे सब मेरे हो जाएं, लेकिन वे तुम्हारे कैसे हो सकते हैं, क्योंकि जिस शरीर में तुम रहते हो जब वो ही तुम्हारा नहीं है तो जगत के पदार्थ तुम्हारे कैसे हो सकते हैं। संसार में समस्त अनर्थों की जड़ यदि कोई है तो उसका नाम है श्री और स्त्री, महाभारत हुआ तो उसके पीछे कारण था श्री और रामायण के पीछे एकमात्र कारण था स्त्री।

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एक वे व्यक्ति होते हैं जो रावण, कौरवों जैसी सोच रखते हैं, वे यही सोचते हैं कि मेरा सो मेरा, तेरा भी मेरा, राम जैसी सोच के लोग यही कहते हैं कि तेरा सो तेरा लेकिन मेरा भी तेरा और भगवान महावीर स्वामी की जैसी जिनकी सोच होती है वे यही सोचते हैं कि म तेरा न मेरा यह संसार तो है चिडिय़ा रैन बसेरा और महावीर स्वामी के अनुयायीउ उनके जैसी सोच रखने वाले ही जीवों को वह उत्तम आकिंचन्य धर्म को धाारण करते हैं क्योंकि वे संसार की असारता को समझते हुए आत्म स्वभाव में लीन हो जाते हैं।

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