गजल… दुनियादारी से जुदा
कर ना पाये कुछ हम दुनियादारी से जुदा
आसां कब था होना दुनिया सारी से जुदा
पग पग पर समझौते किये जीने के लिये
हुए सब उसूल अपने बारी बारी से जुदा
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घर से जब निकले तो हमें अहसास हुआ
है और भी दुनिया इस चार दीवारी से जुदा
दिल का मर्ज ही नहीं बस इक मर्ज तन्हा
मर्ज और भी हैं दिल की बीमारी से जुदा
सुख में तो सब लोग साथ रहे मेरे लेकिन
दुख आया तो हुए सब हुशियारी से जुदा
जी चाहता है बच्चों की तरह खेलूं कूदूं
जीवन में कुछ तो हो अदाकारी से जुदा
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जुदा होना सफर में अपना लाजिमी था
मंजिल तुम्हारी जो थी हमारी से जुदा
जो मांगता है दौलत खुदा से रात दिन
वो धनवान भी कहां है भिखारी से जुदा
– डॉ. विजय कुमार सुखवानी
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