पापमोचनी एकादशी कब है? जानें तारीख, मुहूर्त और महत्व

हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का खास महत्व होता है। खासतौर से चैत्र माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली पापमोचनी एकादशी स्पेशल है। पापमोचनी का अर्थ है पापों को नष्ट करने वाली। ऐसा माना जाता है कि इस एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति के जाने-अनजाने पापों का नाश होता है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा मिलती है। यहां से आप जान सकते हैं कि मार्च के महीने में पापमोचनी एकादशी का व्रत कब और किस दिन है। यहां पापमोचनी एकादशी का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि मौजूद है।
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पापमोचनी एकादशी 2026 मुहूर्त
चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी 14 मार्च 2026 को सुबह 8 बजकर 10 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 15 मार्च 2026 को सुबह 9.16 पर समाप्त होगी.
पूजा मुहूर्त – सुबह 8.01 – दोपहर 12.30
पापमोचनी एकादशी व्रत का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पापमोचनी एकादशी का व्रत व्यक्ति को जाने अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति दिलाता है। मान्यता है कि इस व्रत को पूरे विधि विधान के साथ करने से व्यक्ति के भाग्य में भी वृद्धि होती है। इसलिए पूरी श्रद्धा के साथ इस व्रत को करना चाहिए। साथ ही इस व्रत को पूरी इच्छा के अनुसार, करने से सौभाग्य में वृद्धि होती है। साथ ही एकादशी का व्रत करने वालों को रोग शोक से तो मुक्ति मिलती ही है। साथ ही पाप का नाश होकर मोक्ष की प्राप्ति और पुण्य फल मिलता है।
पापमोचनी एकादशी पूजा विधि-
पापमोचिनी एकादशी व्रत को करने के लिए साधक को इस पावन तिथि पर सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए।
यदि संभव हो तो गंगा नदी जैसे पवित्र जल तीर्थ पर जाकर स्नान करें।
इसके बाद सूर्य देवता को अर्घ्य दें।
भगवान भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए पापमोचिनी एकादशी व्रत को नियमपूर्वक करने का संकल्प लें।
अपने घर के मंदिर या किसी देवालय पर जाकर भगवान विष्णु की गंगाजल, फूल-फल, रोली-चंदन, हल्दी, धूप-दीप, मिष्ठान आदि अर्पित करते हुए पूजा करें। पापमोचिनी एकादशी व्रत की पूजा में इसकी पावन कथा करें।
पूजा के अंत में भगवान विष्णु की आरती अवश्य करें।
इसी तरह इस व्रत का पूरा फल पाने के लिए अगले दिन शुभ मुहूर्त में पारण करें।
पापमोचनी एकादशी व्रत पारण
पापमोचनी एकादशी का व्रत पारण 16वाँ मार्च 2026 को सुबह 06:30 से शुरू होकर सुबह 08:54 के बीच किया जाएगा. पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय सुबह 09:40 है.
पापमोचनी एकादशी कथा-
पापमोचिनी एकादशी की पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में चैत्ररथ नाम का एक बहुत खूबसूरत वन हुआ करता था। जिसमें च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि तपस्या करते थे और इसी जंगल में देवराज इंद्र गंधर्व कन्याओं, अप्सराओं और देवताओं के साथ विचरण भी किया करते थे। इस वन में मेधावी नामक ऋषि थे जो शिव भक्त थे वहीं अप्सराएं शिवद्रोही कामदेव की अनुचरी हुआ करती थीं। एक दिन कामदेव ने मेधावी ऋषि की तपस्या भंग करने के लिए मंजू घोषा नाम की एक बेहद सुन्दर अप्सरा को वन में भेजा। अप्सरा ने मुनि का ध्यान भंग कर दिया।
मुनि मेधावी अप्सरा मंजूघोषा पर मोहित हो गए और इसके बाद दोनों ने साथ रहने का फैसला कर लिया। कई साल दोनों ने साथ में बिताए। फिर एक दिन जब अप्सरा ऋषि से वापिस जाने के लिए अनुमति मांगने लगी तो मेधावी ऋषि को अपनी भूल का एहसास हुआ। जिसके बाद उनके क्रोध का ठिकाना नहीं रहा और उन्होंने मंजूघोषा को पिशाचनी होने का श्राप दे डाला। अप्सरा मंजूघोषा श्राप की बात सुनते ही ऋषि के पैरों में गिर पड़ी। तब मंजूघोषा की विनती सुनकर मेधावी ऋषि का दिल पसीज गया और उन्होंने उसे पापमोचनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी और कहा कि इस व्रत को करने से तुम्हारे सभी पापों का नाश हो जाएगा।
अप्सरा को मुक्ति का मार्ग दिखाने के बाद जब मेधावी ऋषि अपने पिता के पास पहुंचे तो उन्हें श्राप की बात बताई। जिसे सुनकर च्यवन ऋषि ने कहा कि, ‘पुत्र यह तुमने अच्छा नहीं किया, इससे तुम्हें भी पाप लगेगा, इसलिए पाप से मुक्ति के लिए तुम भी पापमोचनी एकादशी का व्रत करो।’ कहा जाता है कि जिस तरह से पापमोचनी एकादशी का व्रत करके अप्सरा मंजूघोषा और मेधावी ऋषि ने पाप से मुक्ति पाई ठीक वैसे ही हर इंसान को अपने-अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए ये व्रत जरूर रखना चाहिए।








