हिम्मत की कहानियां : जिद-जुनून से बदली किस्मत, अपने दम पर कामयाब

वुमंस डे के उपलक्ष्य में बिजनेस वुमन्स ने अक्षरविश्व के साथ साझा की सफलता की दास्तान
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उज्जैन। कहते हैं किस्मत की लकीरें हाथों में नहीं होती हैं लेकिन आज हम उन महिलाओं की बात कर रहे हैं जिन्होंने अपनी किस्मत हाथों की लकीरों से नहीं बल्कि अपने जुनून और जिद से लिखी है। आज का दिन उन महिलाओं के नाम है जिन्होंने घर की चौखट लांघकर आसमान चुना। यह कहानी सिर्फ कामयाबी की नहीं, यह कहानी है उस जिद की जिसने इतिहास बदल दिया। चाहे वह खेल का मैदान हो, स्पेस हो या बिजनेस। आज महिलाएं वहां इसलिए नहीं कि उन्हें मौका मिला बल्कि इसलिए हैं क्योंकि उन्होंने मौका छीन लिया। क्योंकि जब एक महिला कुछ ठान लेती है तो फिर कयामत भी उसका रास्ता नहीं रोक सकती। इस वुमेंस डे (8 मार्च) पर अक्षरविश्व ऐसी ही कुछ महिलाओं से आपको रूबरू करवाने जा रहे हैं जिन्होंने हिम्मत, हौंसले, जिद और जुनून के दम पर ना सिर्फ अपनी किस्मत बदली बल्कि सफलता को भी अपनी मुट्ठी में किया।
सवाल से शुरू हुआ सफर
ह र यात्रा की शुरुआत एक सवाल से होती है, हम चीजों को बेहतर कैसे बना सकते हैं? बायोनिक ग्रुप ऑफ कंपनीज की शुरुआत भी इसी सोच से हुई। बायोनिक शब्द का मतलब है अपने आसपास के सिस्टम और काम करने के तरीकों को अच्छी तरह समझना और उस समझ को तकनीक की मदद से बेहतर बनाना। आज बायोनिक कंपनी के साथ कुल 6 कंपनियां काम कर रही हैं जो आईटी और हेल्थ केयर सेक्टर में कार्यरत हैं। इन सभी का एक ही उद्देश्य है लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना।
यह कहना है उज्जैन की रहने वाली नमिता केलवा का जो वर्तमान में मलेशिया में रहती हैं और सक्सेसफुल बिजनेस वुमन हैं। नमिता बताती हैं कि उनका जन्म और पालन-पोषण उज्जैन में हुआ। छोटे शहरों में जैसे आमतौर पर परिवार में बच्चों से कहा जाता है कि अच्छी पढ़ाई करो और एक अच्छी नौकरी करो, वैसा ही माहौल मेरे घर में भी था। हमारी सोच भी यही थी कि पढ़ाई करके एक सुरक्षित नौकरी करनी है और किसी अच्छी कंपनी में काम करना है। बिजनेस करने का विचार उस समय हमारे दिमाग में नहीं था। इसी रास्ते पर चलते हुए मैंने बीफार्मा (बैचलर ऑफ फार्मेसी) किया और उसके बाद रेग्यूलेरिटी अफेयर्स में मास्टर्स किया। इस पढ़ाई की वजह से मुझे अपने देश में ही अच्छी नौकरी मिली। वर्ष 2012 में मुझे मलेशिया में काम करने का अवसर मिला। मैंने मलेशिया में रेग्यूलेरिटी अफेयर्स के क्षेत्र में कॅरियर शुरू किया। शुरुआत आसान नहीं थी। भाषा की समस्या और संस्कृति का अंतर होने से सरकारी संस्थानों के साथ काम करना चुनौतीपूर्ण था लेकिन धीरे-धीरे इन चुनौतियों को पार करना सीख लिया।
समय के साथ मैंने सेल्स और बिजनेस डेवलपमेंट में काम करना शुरू किया। काम के दौरान मुझे कई बार ऑपरेशन थिएटर (ओटी) में सर्जरी देखने का मौका मिला। मैं हमेशा डॉक्टरों को देखकर बहुत प्रभावित होती थी कि वे कैसे कई-कई घंटों तक पूरी एकाग्रता से जटिल सर्जरी करते हैं और मरीजों की जान बचाते हैं। मैं भी किसी न किसी तरह उस सिस्टम का हिस्सा बनना चाहती थी। जब मैंने ओटी में काफी समय बिताया तो मैंने एक आम समस्या देखी। हर ऑपरेशन थिएटर में नॉन-वोवन सर्जिकल कंज़्यूमेबल्स अलग-अलग जगह पर रखे होते थे। सर्जरी शुरू करने से पहले स्टाफ को इन सभी चीजों को अलग-अलग इक_ा करना पड़ता था जिससे ऑपरेशन थिएटर तैयार करने में 30 मिनट से 1 घंटा लग जाता था। यहीं से विचार आया कि क्यों ना ऑपरेशन थिएटर के लिए सारी जरूरी चीजें एक ही समाधान के रूप में उपलब्ध करवाई जाएं? इसी विचार से बायोनिक मेडिकल डिवाइस की शुरुआत हुई। वर्ष 2021 में हमने मलेशिया में दो प्रोडक्शन लाइनों के साथ काम शुरू किया। हमारा उद्देश्य था ऑपरेशन थिएटर के लिएवन-स्टॉप सर्जिकल कंज़्यूमेबल समाधान देना। धीरे-धीरे हमने अपने प्रोडक्ट्स की सप्लाय मलेशिया, फिलीपींस, इंडोनेशिया और मिडिल ईस्ट तक शुरू कर दी।
भारत में नया अध्याय
भारत सरकार की नीतियां जैसे स्टार्टअप इंडिया, एमएसएमई और वुमन आंत्रप्रन्योर योजनाएं और मप्र सरकार की एमपीआईडीसी जैसी योजना मैन्यूफैक्चरिंग के लिए बहुत सहायक हैं। मप्र सरकार के सहयोग से हमने अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट भारत में स्थापित की। जिससे उत्पादन क्षमता बढ़ी, नई प्रोडक्शन लाइनों की शुरुआत हुई और हमारी कार्यक्षमता बेहतर हुई। आज हम गर्व से कह सकते हैं कि हमारे प्रोडक्ट कीमत और गुणवत्ता दोनों के मामले में चीन जैसे देशों से प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।
महिलाओं के लिए मेरा संदेश
मैं सभी महिलाओं से कहना चाहती हूं कि अपने कम्फर्ट झोन से बाहर निकलें। अपने आसपास देखें। हर सिस्टम, हर प्रक्रिया और हर काम को बेहतर बनाया जा सकता है। अगर आप ध्यान से चीजों को देखें, उन्हें समझें और तकनीक की मदद से सुधार करने की सोच रखें तो आपके अंदर पहले से ही बायोनिक सेाच है। जिज्ञासु बनें, साहसी बनें, नया सोचें और सबसे महत्वपूर्ण खुद पर गर्व करें और अपने सपनों को पूरा करने का साहस रखें।
हिम्मत से जिंदा रखे सपने

मू लत: आगर मालवा की रहने वाली दिव्या का सपना बचपन से डॉक्टर बनने का था लेकिन ज्यादा पढ़ाई के लिए घरवाले तैयार नहीं थे और शादी की तैयारियों में जुट गए। इसी बीच मैंने पीएमटी की एग्जाम दी और एमबीबीएस में सिलेक्शन हो गया। स्टडी के लिए मलेशिया जाना था लेकिन माता-पिता ने इंकार कर दिया। इसी बीच मेरी शादी कर दी जिसके लिए मैं तैयार नहीं थी। शादी के एक साल तक टूटते सपने को देखकर टेंशन में रही, इसी बीच बेटी पैदा हो गई। इसके बाद बेटी के साथ घर के पास बने एनजीओ में जाने लगी। इसके बाद बिजनेस को समझने लगी। सिलाई सीखी, बुटिक पर गई, कॉलेज से फैशन डिजाइनिंग किया और 2016 में लोन लेकर अपना बुटिक खोला।
धीरे-धीरे मैंने चार बुटिक खोल दिए। फिर अचानक कोरोना आ गया जिससे काफी नुकसान हुआ। इसी बीच एक और बेटी पैदा हो गई। दोनों बेटियों के साथ बुटिक मैनेज करने की कोशिश की, इस कशमकश में दो बुटिक बंद करना पड़े। मैंने शादी में मिले बर्तन बेचे, शादी की ज्वैलरी बेची और 10 लाख का लोन लेकर कपड़े की शॉप खोली लेकिन शॉप चल नहीं सकी और सारा माल डेड हो गया लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी और रेस्टोरेंट खोला। आज मेरे दो बुटिक और रेस्टोरेंट अच्छे चल रहे हैं। एक साल का टर्नओवर डेढ़ करोड़ के करीब है और 25 लोग मेरे साथ काम करते हैं।
मैं बस इस वुमंस डे पर यही कहना चाहूंगी कि हमें कभी हिम्मत नहीं हारना चाहिए। समय चाहे जैसा भी हो, खूब मेहनत करना चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण बात कि सिर्फ अपने बिजनेस या काम पर फोकस करो, एक दिन सफलता जरूर मिलेगी।
हां, मैं भी योद्धा हूं…

यो द्धा शब्द का मतलब रणभूमि में लडऩे वाले रणबांकुरों से होता है लेकिन मैं हर उस स्त्री के लिए योद्धा शब्द का इस्तेमाल करूंगी जिन्होंने जीवन की हर परिस्थिति का सामना डटकर किया। यह कहना है विजयश्री सुनील धामाणी का। अपने सफर के बारे में बात करते हुए विजयश्री बताती हैं कि वर्ष २००५ में पति की असमय मौत हो गई जिससे मैं डिप्रेशन में चली गई। जिंदगी के रंग फीके पड़ गए थे लेकिन बच्चों के भविष्य और स्वयं को इस परिस्थिति का सामना करने के लिए खुद से लडऩा शुरू किया। सोचा जो हुआ वह नियति थी और जो आने वाला समय है, वह संघर्ष है। इस विकट परिस्थिति के दौरान परिवार सहित समाज, मित्र एवं शभुचिंतकों ने पूरा सहयोग किया। मैं कोई सुपर वुमन या दिव्य स्त्री नहीं हूं। मैं सिर्फ एक महिला हूं जो सहज और सरल रहकर अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों का को निर्वाह करना चाहती हूं, उन रिश्तों और परिवार को संभालना चाहती हूं जिन्होंने मुझे सही मायनों में जीवन जीने की नई दिशा दी। आज में गर्व से कह सकती हूं कि मैं भी योद्धा हूं जिसने कठिन समय में घुटने नहीं टेके और सबसे साथ लेकर आगे बढऩे का प्रयास किया।
इन्होंने भी किया आसमां मुट्ठी में
खुद को काबिल बनाया, रोजगार दिया

महिदपुर के ग्राम भीमाखेड़ा की रहने वाली सरोज मुवाला मसाला उद्योग चलाती हैं। पहले वह घर से ही छोटे स्तर पर काम करती थी जिससे बचत भी कम हो पाती थी। इसके बाद वह आजीविका मिशन से जुड़ी और पिसे मसालों का बिजनेस शुरू किया, मशीनें खरीदी और इसे आगे बढ़ाया। धीरे-धीरे बिजनेस बढ़ा तो मुनाफा भी बढऩे लगा। आज पूरा परिवार उनके साथ है। अपने हालात बदलने के बाद उन्होंने 8 और महिलाओं को अपने साथ जोड़ा। आगे उनक लक्ष्य बड़ी यूनिट लगाकर १०० महिलाओं को जोडऩा है।
मायके पर कभी नहीं बनी बोझ

ग्राम कचनारिया की रहने वाली संजू गिरी ने समस्या होने के चलते ससुराल छोड़ा और मायके आ गईं। परिवार पर बोझ नहीं बनना चाहती थी इसलिए कुछ करने की ठानी। संजू ने समूह और बैंक से लोन लेकर अपना आरओ प्लांट शुरू कर जीवन की नई राह चुनी। इसके बाद पारिवारिक आय में बदलाव आया और उन्होंने गाड़ी खरीदकर इस बिजनेस को नई ऊंचाइयां दीं। इससे संजू को हिम्मत आई और उन्होंने अपने बिजनेस से अन्य महिलाओं को भी जोड़ लिया। आज वह कई महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं।
कैंसर से जंग जीतकर मिसाल बनीं

पेशे से निजी स्कूल संचालक और प्राचार्य बिंदू सोनी ने अपने जीवन के संघर्षों को साहस से जीतकर समाज में मिसाल कायम की है। मूलत: केरल और वर्तमान में अकोदिया में रहने वाली बिंदू सोनी ने दो बार कैंसर से जंग जीती और आज भी पूरी ऊर्जा और सकारात्मकता के साथ बच्चों के उज्जवल भविष्य के साथ समाजसेवा में भी सक्रिय हैं। इसके अलावा भी नई संगठनों में अलग-अलग पदों पर हैं। उनका संघर्ष, साहस हमें संदेश देता है कि मन में दृढ़ निश्चय हो तो कोइ कठिनाई रास्ता नहीं रोक सकती।











