बारिश नहीं होने से सोयाबीन की स्थिति खराब

By AV NEWS

फसलें सूखीं, गांवों में टोटके और प्रार्थना का सहारा, पानी गिर भी गया तो फसल पकने वाली नहीं

बारिश नहीं होने से सोयाबीन की स्थिति खराब

अक्षरविश्व न्यूज. उज्जैन:बारिश की लंबी खेंच से सोयाबीन फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। उज्जैन के आसपास में सैकड़ों एकड़ में फसल सूख गई हैं। सोयाबीन की फलियां सूख कर कड़क हो गई हैं। कई जगह आधी फसल खराब हो गई है। अभी भी चार या पांच दिन में पानी नहीं गिरा तो बची हुई उम्मीद पर भी पानी फिर जाएगा। गांवों में इंद्रदेव को मनाने के लिए अपने तरह से कोशिशें की जा रही हैं। इधर बिजली संकट की वजह से किसान अपनी फसल की सिंचाई नहीं कर पा रहे हैं।

अब जानिए किसानों का दर्द, उन्हीं की जुबानी
फसलों की हालत देख रूआंसे किसानों को कहना है कि बारिश नहीं होने से सोयाबीन फलियां कड़क हो गई हैं जबकि अभी पकी ही नहीं है। अब अगर बारिश हो भी गई तो फसल के जिंदा होने की कोई उम्मीद नहीं है। कुछ किसानों ने 15 दिन पहले बारिश नहीं होने पर बोरवेल का पानी फसलों में दे दिया था। बावजूद ग्रोथ नहीं हो रही है, उलटे अब खराब हो गई है। इस बार कम बारिश से दो अलग-अलग वैरायटी की फसलों को नुकसान हो गया। अब पानी गिर भी गया तो भी सोयाबीन नहीं पकने वाली।

जुलाई महीने की बारिश से कलियां और फूल आ गए थे

दरअसल इस बार उज्जैन में जुलाई के दौरान अच्छी बारिश हुई थी। इससे फली और फूल बनना शुरू हो गए थे। इसके बाद किसानों को अगस्त में अच्छी बारिश की उम्मीद थी। अगस्त में हुई कम बारिश से दाने नहीं फूले और फसलें खराब होना शुरू हो गई। ऐसी ही स्थिति 120 दिनों की सोया फसलों की है। अगस्त में इनकी फलियां बनना शुरू हुई और दाने बनना थे। अगस्त सूखा रहा। इसके चलते फलियांकड़क हो गई हैं। इसके साथ ही ये फसलें भी पीली पड़ गई हैं।

बारिश नहीं होने तथा तापमान बढऩे से बर्बाद हो रही फसलें

मौसम की मार यही खत्म नहीं हुई। अगस्त में बारिश नहीं होने से कई बार तापमान सामान्य से अधिक रहा तो इससे भी फसलों को नुकसान हुआ। इन फसलों में बीमारी (फफूंद) लग गई। किसान अपनी फसलों की हालत देखकर बहुत दुखी हैं। इन किसानों ने बताया पिछले हफ्ते तक अगर थोड़ी भी बारिश होती तो फसलें खराब होने से बच जाती। अभी भी तीन-चार दिन बारिश के आसार नहीं हैं। ऐसे में जो फसलें 120 दिनों की हैं वे भी पूरी तरह खराब हो जाएंगी। बारिश नहीं होने व तापमान ज्यादा होने से खेतों में दरारें पड़ गई। इसके साथ ही फसलों को बीमारी लग गई। सोयाबीन की फसलों का विशेषता यह है कि इसकी ग्रोथ प्राकृतिक रूप से हुई बारिश से ही होती है। बोरवेल, ट्यूबवेल के पानी से आधी से भी कम फसलें ग्रोथ कर पाती है। फिर अभी जिस तरह से तापमान ज्यादा है ऐसे में किसान कितने घंटे सिंचाई कर लेगा क्योंकि जमीन पानी जल्द सोख लेगी।

उज्जैन ही नहीं पूरे प्रदेश में अधिकांश स्थानों पर फसलों की हालत खराब है। किसानों को नुकसान की स्थिति में फसल बीमा का लाभ मिलेगा। कुछ किसानों की फसलें कुछ ठीक है,जिन्होंने स्प्रिंगलर या किसी अन्य माध्यम से सिंचाई ही। मामले में अभी सर्वे या मुआवजे को लेकर अभी कोई दिशा-निर्देश नहीं हैंं। आरपीएस नायक, उपसंचालक कृषि

संकट : सिंचाई के लिए चाहिए 16 घंटे बिजली मिल रही सिर्फ 4 घंटे

बारिश के साथ ही अब बिजली का सितम भी शुरू हो गया है, जिसमें शहर की बिजली सप्लाई गड़बड़ाने लगी है तो ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली सप्लाई का समय कम यानी कटौती की जाने लगी है। बारिश के दिनों में गरमी शुरू होने से पंखे, एसी तथा कूलर का उपयोग बढऩे तथा बारिश की लंबी खेंच के चलते फसलों को हो रहे नुकसान को देखते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई कार्य शुरू करने से बिजली की डिमांड बढ़ गई है। आने वाले दिनों में बारिश नहीं हुई तो बिजली की डिमांड और बढ़ेगी, ऐसे में बिजली का संकट खड़ा हो सकता है। सिंचाई कर फसल को बचाने के लिए किसानों को अतिरिक्त बिजली की आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 20 घंटे कटौती की जा रही है। सिंचाई के लिए मात्र तीन से चार घंटे ही बिजली मिल पा रही है। ट्रांसफार्मर के जलने पर उसे बदला भी नहीं जा रहा है।

बारिश नहीं होने और गरमी तथा उमस होने से बिजली की खपत बढ़ गई है। पिछले साल की तुलना में अधिकतम डिमांड 200 मेगावॉट तक बढ़ गई है। पीएस चौहान, एसई बिजली कंपनी

समय पर सिंचाई नहीं तो फसल हो जाएगी बर्बाद

भारतीय किसान संघ के प्रदेशाध्यक्ष कमलसिंह आंजना का कहना है कि बारिश नहीं होने से फसलें सूखे लगी हैं, उन्हें समय पर पानी नहीं दिया गया तो फसल बर्बाद हो जाएगी। ऐसे में ऊर्जा विभाग को ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त बिजली सप्लाई करना चाहिए ताकि सिंचाई कर फसलों को बचाया जा सके। जून माह में शुरू हुई बारिश पहले तो अच्छी हुई और उसके बाद अगस्त-सितम्बर आते-आते बारिश बंद हो गई और गर्मी शुरू हो गई, जिससे जिले में सूखे जैसे हालात बन गए हैं।

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