संभलकर वाहन चलाएं… टाटा को चेतावनी-पेनल्टी का कोई असर नहीं

शहरभर में सीवरेज के ऊंचे-नीचे चैंबर, कई जोखिमभरे और जानलेवा

अक्षरविश्व न्यूज. उज्जैन:शहरवासी वाहन संभलकर चलाएं, इसलिए कि टाटा द्वारा किए जा रहे सीवरेज के कार्य में लगातार लापरवाही बरती जा रही है। शहरभर में लाइन के चैंबर ऊंचे-नीचे हैं। इनमें से कई स्पॉट जोखिमभरे व जानलेवा है। टाटा को काम के लिए अनेक बार चेतावनी मिलने के साथ ही पेनल्टी भी भरना पड़ है। इसका कोई असर नजर नहीं आ रहा है।
सड़क पर संभलकर कर चलना तो वैसे भी आवश्यक है,लेकिन सड़क के हालात देखकर सर्तकता भी बहुत ही जरूरी है,क्योंकि कदम-कदम पर खतरा है। सावधानी बरतना इसलिए जरूरी है कि रात के समय चैंबर की ऊंचाई-गहराई का अंदाजा लगाना मुश्किल रहता है। बारिश भी आने वाली है,सड़क पर बरसात का पानी भर जाने से चैंबर नजर ही नहीं आता है। ऐसे में हादसे की आशंका ज्यादा रहती है।
टाटा प्रोजेक्ट लिमिटेड के जिम्मेदार तो जनप्रतिनिधि-अफसर किसी की नहीं सुन रहे हैं। इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इन्हें ये प्रोजेक्ट नवंबर 2019 में पूरा कर देना चाहिए था, जो अब चाल साल बाद तक भी जारी होकर अधूरा ही है। आम और खास हर कोई इससे त्रस्त है। इधर, इन तमाम परिस्थितियों के बीच शहरवासियों के मन से बड़ा सवाल यह भी आ रहा है कि क्या ये भूमिगत सीवरेज लाइन सक्सेस हो पाएगी कहीं इसका भी तापी की पाइप लाइन के जैसा ही हश्र तो नहीं होगा यानी करोड़ों रुपए की लाइन बिछाई और काम नहीं आई, जैसा।
प्रोजेक्ट और उसकी धीमी चाल
शिप्रा की शुद्धि और शहर की स्वच्छता के उद्देश्य से टाटा प्रोजेक्ट लिमिटेड को शहर में 413 किमी भूमिगत सीवरेज लाइन बिछाने और सुरासा में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाने का ठेका दिया गया था, ताकि घरों से निकलने वाला गंदा पानी अंडरग्राउण्ड से बहकर जाए। अनुबंध के तहत 438.5 करोड़ की लागत से इस प्रोजेक्ट का कार्य 2017 में शुरू होकर नवंबर 2019 में पूरा हो जाना चाहिए था।
जनता को परेशानियां
टाटा द्वारा खोदी गई सड़क व चैंबर के गड्ढों के कारण आवागमन बाधित रहता आया है।
सड़कों की स्थिति खराब हो गई। लोगों को कई दिनों तक नलों का पानी नहीं मिला, क्योंकि टाटा द्वारा पाइप लाइन ही डैमेज कर दी जाती रही। या फिर नल कनेक्शन क्षतिग्रस्त किए जाते रहे।
गड्ढों के कारण हादसे हुए जिनमें कुछ मौतें हुई। कई लोग घायल भी हुए।
हादसों को रोकने के लिए ठोस रणनीति नहीं बन पाई।
खोदे गए गड्ढे में पाइप डालने के बाद के उसे तुरंत भरें लेकिन कंपनी के जिम्मेदारों ने इसमें गंभीरता नहीं दिखाई। लोग परेशान होते रहे।
गड्ढों के आसपास बैरिकेडिंग करना आवश्यक है लेकिन इस सामान्य बात पर भी ध्यान नहीं दिया गया।
दो वर्ष में पूरे किए जाने वाले काम को 6-7 साल में भी पूरा नहीं कर पाने की कंपनी की गति व लापरवाही पर मंत्री व विधायक से लेकर सांसद तक विरोध दर्ज करा चुके हैं लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा।
टाटा पर लापरवाही और काम की धीमी चाल के चलते अब तक करीब 2२५ करोड़ रुपए के जुर्माने व कटोत्रे आदि की कार्रवाई की जा चुकी है।
तर्क यह कि कोरोना काल, साइड क्लियर नहीं होने से, श्रमिक नहीं मिलने से, संसाधन नहीं मिलने से व पेमेंट वक्त पर होने से कार्य में देरी हुई।









