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एक खबर से कलेक्टर और प्रशासक आमने-सामने

पीआरओ का हस्तक्षेप होता तो नौबत ही नहीं आती

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अक्षरविश्व न्यूज|उज्जैन। महाकाल मंदिर में हुए एक निर्माण का मामला सुर्खियां बटोर रहा है। शहर के राजनीतिक गलियारों से कूदती-फांदती यह खबर राजधानी भी पहुंच गई है। मीडिया के एक प्लेटफार्म पर जारी हुई एक खबर को कलेक्टर ने सही मानते हुए प्रशासक को नोटिस दिया। उसके बाद खबर अपने आप हवा में लहराने लगी।

कुछ लोगों ने कहा कि इस खबर के मूल में महाकाल मंदिर का जनसंपर्क विभाग है। जो निष्क्रिय है। इस विभाग को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर देना चाहिए। मीडिया को जब खबरें अपने सूत्रों से मिल जाती हैं, प्रशासक और सहायक प्रशासक के पुष्टि के लिए बयान आ जाते हैं तो जनसंपर्क अधिकारी को बनाए रखने की जरूरत क्या है? वैसे भी तीन साल पहले प्रदेश सरकार ने जनसंपर्क अधिकारी को हटा दिया था। महाकाल मंदिर की व्यवस्थाओं और समाचारों में प्रमाणिकता लाना है तो कलेक्टर को कड़ा निर्णय लेना पड़ेगा। अन्यथा महाकाल मंदिर की खबरें अंदर से निकलेंगी और देश भर में मंदिर समिति की बदनामी होती रहेगी।

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महाकाल मंदिर समिति के बायलॉज के बारे में बताया जाता है कि इसमें पीआरओ का कहीं उल्लेख नहीं था। कालांतर में प्रशासक रहे जयंत ने यह व्यवस्था बनाई और पीआरओ नियुक्ति हुई। तब से आज तक व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं हुआ। मंदिर में कई विवाद हुए। खबरें नेशनल मीडिया में सुर्खियां बटोरती रहीं। जनसंपर्क अधिकारी का कहीं हस्तक्षेप नजर नहीं आया। चर्चा तो यहां तक है कि महाकाल मंदिर समिति की ओर से होने वाले सांगीतिक कार्यक्रम में भी कई वरिष्ठ कलाकार निराश और नाराज होकर गए। कार्यक्रम कैसे हो रहे हैं, यहां का प्रबुद्ध वर्ग जानता है। जिस तरीके से जनसंपर्क विभाग द्वारा प्रचार-प्रसार होना चाहिए, नहीं होता।

इतनी राशि खर्च करने की जरूरत क्या है?

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बड़ी राशि खर्च कर मंदिर समिति की ओर से कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों का लाभ शहर के लोगों को नहीं मिल पाता। चार पोस्टर टंगवा देने से प्रचार नहीं होता। इस वर्ष का कालीदास समारोह शताब्दी का सबसे नीरस और निराशा भर देने वाला आयोजन हुआ। भीड़ नहीं जुट सकी। या यूं कहें कि भीड़ जुटाने के वह प्रयास नहीं हुए जो होना चाहिए थे। बड़ी राशि खर्च हुई और मु_ी भर लोग ही आयोजन में आए। यही हाल सांझी महोत्सव का रहता है। यदि जनसंपर्क अधिकारी जनता के बीच का हो। लोगों के बीच रहे। यहां के लोगों से जीवित संपर्क रहे तो आयोजन में जुटने वाली भीड़ में इजाफा होगा।

महाकाल मंदिर और पीआरओ

महाकाल लोक बन जाने के बाद महाकाल मंदिर में लाखों की भीड़ उमड़ रही है। बाहर से आने वाली टे्रनें भरी हुई आ रही हैं। मंदिर में कई व्यवस्थाएं हैं जिनके बारे में लोगों को जानकारी नहीं है। मीडिया को भी पता नहीं चलता कि कब क्या होने वाला है। कई बड़े कलाकारों का बाबा के प्रति रुझान बढ़ा है।

वे कोई शार्ट नोटिस पर तो नहीं आ जाते हैं? उनके आने की सूचना एक दिन पहले आ जाती है, लेकिन मीडिया को पता नहीं चल पाता कि कौन आ रहा है कौन जा रहा है। पीआरओ का यह दायित्व है कि वह मीडिया के संपर्क में रहे। लेकिन ऐसा नहीं होता। बड़े नेता आते हैं चले जाते हैं, मीडिया को सूचना नहीं मिलती। महाकाल मंदिर को ऐसे पीआरओ की जरूरत है जो वीआईपी के आने पर साथ में रहे। मीडिया को टिप्स दे। पीआरओ ऐसा हो जो नई व्यवस्थाओं, प्रोजेक्ट और प्रगति के लिए प्रेस वार्ता आयोजित करे। चर्चा यह भी है कि आज कलेक्टर और प्रशासक के बीच जो हुआ है, उसमें पीआरओ का हस्तक्षेप होता तो यह नौबत ही नहीं आती।

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