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शिवरात्रि महोत्सव पर यातायात प्रबंधन है बड़ी चुनौती

1. प्रशासन के लिए बहुत बड़ी चुनौती है

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2.दस लाख लोगों के आने की है संभावना

3.प्रशासन ने अपने स्तर पर बनाई योजना…

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4.पूरे देश के मीडिया की नजर है उज्जैन पर…

5. वरिष्ठ अधिकारी करेंगे व्यवस्था की समीक्षा

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नरेंद्रसिंह अकेला उज्जैन। प्रयागराज कुंभ से अनुभव लेकर लौटे अधिकारियों ने शिवरात्रि के लिए भारी-भरकम योजना बनाई है। सिंहस्थ २०२८ के लिए प्रशासन मुस्तैदी से जुटा हुआ है। शिवरात्रि महापर्व प्रशासन के लिए चुनौती है। शासन के नुमाइंदों की भी प्रशासन पर पूरी नजर है। दस लाख श्रद्धालुओं के आगमन की संभावना जताई गई है। इतनी तो शहर की आबादी भी नहीं है। संख्या बड़ी है, चुनौती मुंह बाए खड़ी है। प्रशासन ने अपने अनुभव से योजना बनाई है। इसमें शहर के जिम्मेदारों और अनुभवियों का योगदान नहीं है। शांति समिति की बैठक भी नहीं हुई है। होती तो शायद कुछ सुझाव आ जाते। बहरहाल, प्रशासन को भरोसा है

सबकुछ अच्छा होगा।
प्रशासन के हर अधिकारी और हर विभाग के लिए शिवरात्रि का महापर्व परीक्षा की घड़ी लेकर आया है। अधिकारी अब नए नहीं रहे। सभी को उज्जैन के चप्पे-चप्पे की जानकारी हो गई है। उन्हें पता है कि कमी कहां रह सकती है। इसलिए एक महीने से दौड़ धूप चल रही है।

कलेक्टर को पता है प्रथम की चुनौती

कलेक्टर नीरज कुमार सिंह को पता है कि महाकाल मंदिर में क्या होता है। वे रोजाना जाते हैं और व्यवस्था देखते हैं। दर्शन कांड का पर्दाफाश उन्हीं ने किया था। उन्हें यह भी पता है कि प्रथम कौशिक के लिए यह पहला बड़ा आयोजन है इसलिए महाकाल की प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव करते हुए नौ अफसरों की ड्यूटी लगाई है। बहुत बारीकी से काम हुआ है। अब देखना है कि यह अधिकारी महाकाल मंदिर के प्रशासक के लिए कितने मुफीद साबित होते हैं।

वरिष्ठ अधिकारियों ने भी मोर्चा संभाला

महाशिवरात्रि को देखते हुए वरिष्ठ अधिकारियों ने भी अपना कैबिन छोड़ा है। संभागायुक्त एसके गुप्ता, एडीजीपी उमेश जोगा और डीआईजी नवनीत भसीन भी मैदान में उतरे हैं। इन अधिकारियों ने भी दौरा कर व्यवस्थाओं का न सिर्फ जायजा लिया है बल्कि निर्देश भी दिए हैं। इन अधिकारियों की भी महापर्व के दिन पूरी नजर रहेगी। इनके मातहतों को बेहतर करके दिखाना होगा। सबसे बड़ी शहर की जनता है। अधिकारियों को इसी की कसौटी पर खरा उतरना है।

एसपी ने पूरा अनुभव निचोड़ा है व्यस्था के लिए

एसपी प्रदीप शर्मा ने शहर का लगातार दौरा किया और अपने विश्वसनीय साथियों से मिले फीडबैक के आधार पर यातायात और पुलिस की व्यवस्था बनाई है। यानी इसमें पूरा अनुभव निचोड़ा है। भारी भरकम पुलिस बल तैनात करने की योजना बनाई है। प्रयागराज में लगे पुलिस बल की पूरे देश में प्रशंसा हुई। वहां व्यवस्था बिगडऩे पर भी पुलिस विनम्र रही। किसी से बदतमीजी नहीं की। पुलिस का व्यवहार मृदु और शीतल बना रहा। यहां भी यही निर्देश दिए गए हैं।

पहला स्नान सुपर फ्लॉप साबित हुआ था…

2016 में प्रशासन ने कागज पर शानदार योजना बनाई थी। इस योजना में श्रद्धालुओं को लंबा चलना था। पूरा शहर पैक कर दिया गया था। मीडिया सक्रिय था। इसके मार्फत बाहर से आने वालों को प्रशासन की योजना पता चल गई। श्रद्धालुओं ने कन्नी काट ली। शहर के लोग भी घरों में कैद हो गए। अधिकारी मुंह देखते रह गए। पहला स्नान सुपर फ्लॉप हुआ। प्रदेश सरकार हिल गई। प्रभारी मंत्री भूपेंद्र सिंह को ताबड़तोड़ यहां भेजा गया। व्यवस्था बदली तब दूसरा स्नान ठीक हुआ।

सारा दारोमदार यातायात पुलिस पर ही है
शहर की यातायात व्यवस्था इस समय सबसे ज्यादा बिगड़ी हुई है। लोगों का कहना है कि चौराहों पर यातायात के पुलिस कर्मी खड़े होना भूल गए हैं। ऐसा लगता है कि शायद उनसे कहा गया हो कि आप कोने में खड़े रहिए। यातायात पुलिस को लेकर जबदस्त प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। आईआईएम के अधिकारियों को पिछले दिनों सीएम ने यहां भेजा था। उनकी भी प्रतिक्रिया यही थी कि यहां का यातायात बहुत बेकार है। सिंहस्थ में यही तकलीफ देगा। अब देखना है क्या होता है।

अतिक्रमण के लिए सिर्फ दिखावा ही हुआ

शहर की यातायात बिगाडऩे में सबसे बड़ा योगदान अतिक्रमण का है। प्रशासनिक अधिकारी भी बोल चुके हैं कि अतिक्रमण हट जाए तो यातायात व्यवस्था में बदलाव आ जाएगा। इसे लेकर लोगों ने कड़ी टिप्पणी की है। लोगों का तो यहां तक कहना है कि अतिक्रमण हटाने के नाम पर सिर्फ दिखावा किया गया है। सीएम तक यह रिपोर्ट भी भेजी गई है। बताया गया है कि यहां अतिक्रमण हटाने के नाम पर औपचारिकता की जा रही है। नगर निगम की गैंग कुछ नहीं कर रही है।

प्रशासन अकेला कुछ नहीं कर सकता

यह शहर धार्मिक उत्सवों का शहर है। यहां होने वाले उत्सवों में प्रशासन के साथ जनता की भी भागीदारी भी रहती है। अभी तक तो ऐसा ही होता आया है। इस बार ऐसा क्यों नहीं हुआ यह लोगों की समझ से परे है। वरिष्ठ समाजसेवियों का कहना है कि बड़े उत्सव प्रशासन अकेला नहीं सकता। यहां के वरिष्ठों ने कई कुंंभ और सिंहस्थ देखे हैं। उनका कहना है कि जवानों में जोश भले ही हो, लेकिन बुढ़ापा अनुभवी होता है। जोश और जुनून पर अनुभव भारी पड़ता है।

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