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सिंगल मदर भी पूर्ण गार्जियन : बॉम्बे हाइकोर्ट

बच्चे की पहचान उससे क्यों जोडऩा जिससे कोई संबंध नहीं

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मुंबई। बॉम्बे हाइकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने बच्ची के पिता का नाम स्कूल के रिकॉर्ड्स से हटाने की रेप पीडि़त मां की याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि बच्चे का पालन-पोषण अकेले करने वाली मां को पूर्ण अभिभावक मानना दया नहीं, संविधान के प्रति निष्ठा है।

जस्टिस विभा कांकणवाड़ी और जस्टिस हितेन वेणुगावकर की पीठ ने कहा कि बच्चे की पहचान ऐसे पिता से क्यों जोडऩी, जिसका जीवन में कोई संबंध नहीं? संविधान का अनुच्छेद 21 सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है और पहचान भी उसी गरिमा का हिस्सा है। दरअसल, इस मामले में मां दुष्कर्म पीडि़ता है। डीएनए टेस्ट से आरोपी बॉयोलॉजिकल पिता सिद्ध हुआ था। लेकिन उसने बच्चे से अलग रहना चुना। इसके बावजूद जन्म प्रमाणपत्र और स्कूल रिकॉर्ड में पिता का नाम दर्ज था। स्कूल ने इसमें संशोधन से इनकार किया गया तो मां-बेटी हाइकोर्ट पहुंचीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्कूल जाति प्रमाणन प्राधिकरण नहीं, पर स्पेशल केस में रिकॉर्ड को ठीक किया जा सकता है।

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सिंगल मदर्स के अधिकारों को पहचानना जरूरी

औरंगाबाद सीट पर बैठी जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और जस्टिस हितेन वेनेगावकर की डिवीजन बेंच ने 2 फरवरी को यह फैसला सुनाया था। बेंच ने कहा कि जो महिलाएं अपने बच्चों की परवरिश अकेले करती हैं, उनके अधिकारों को प्रशासनिक स्तर पर भी मान्यता मिलनी चाहिए।

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बेंच ने अपने फैसले में क्या कहा

बच्चे की नागरिक पहचान के लिए सिंगल मदर को पूरी पेरेंट मानना कोई दान का काम नहीं है, यह संवैधानिक वफादारी है। यह पितृसत्तात्मक मजबूरी से संवैधानिक पसंद की ओर बदलाव दिखाता है। समाज खुद को विकसित कहता है, तो वह इस बात पर जोर नहीं दे सकता कि बच्चे की सार्वजनिक पहचान ऐसे पिता से जुड़ी रहे, जो उसकी जिंदगी से गायब है। जब मां अकेली गार्जियन हो, तो स्कूल रिकॉर्ड में पिता का नाम और सरनेम हटाकर मां का नाम और सरनेम दर्ज करना चाहिए।

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