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इंटरनेशनल पैरा खिलाड़ी तैयार कर रहे अब नई पीढ़ी

हाथ छूटा… मगर हौसला आसमान छू गया!, एक हाथ से दुनिया को दिखाया कमाल

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विजयाराजे सिंधिया स्टेडियम में उज्जैन जिला बैडमिंटन एसोसिएशन अध्यक्ष वैभव यादव के नेतृत्व में चल रही राज्य स्तरीय जूनियर बैडमिंटन स्पर्धा में कोच के रूप में शामिल होने आए अंतरराष्ट्रीय पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी राहुल सिंह विमल ने अक्षरविश्व के साथ अपनी यात्रा साझा की।

पवन पाठक उज्जैन। पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी राहुल सिंह विमल की कहानी हर उस युवा के लिए प्रेरणा है, जो हालात से हार मान बैठते हैं… युगांडा में गोल्ड-सिल्वर जीतकर लौटे राहुल अब खिलाडिय़ों को भी उड़ान दे रहे हैं। भिंड के रहने वाले राहुल सिंह विमल सिर्फ एक पैरा एथलीट नहीं, बल्कि हौसले की उड़ान का नाम हैं। वो खुद खेलते हैं, बच्चों को उडऩा सिखाते हैं, और उम्मीद करते हैं कि देश उनके जैसे खिलाडिय़ों के लिए खड़ा हो।

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एक हाथ से रैकेट थामे यह खिलाड़ी न सिर्फ शटल पर जबरदस्त प्रहार करते हैं, बल्कि हर युवा के भीतर छिपे डर को भी दूर करता है। उन्होंने 2012 में एक हादसे में अपना बायां हाथ गंवा दिया था, लेकिन इसने उनके सपनों को नहीं रोका। वह विरोधियों को अपने बेहतरीन शॉट्स से चकित कर देते हैं। उनकी सबसे बड़ी खासियत है उनके स्मैश और फुटवर्क। इसके वह अपने प्रतिद्वंदियों के बैडमिंटन कोर्ट पर हौसले पस्त कर देते हैं।

6 पदक जीत चुके हैं अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में

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Q. आपने कितने मेडल जीते हैं?
A. हाल ही में युगांडा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय पैरा बैडमिंटन टूर्नामेंट से लौटा हूं। मैंने इस प्रतियोगिता में 2 पदक हासिल किए हैं। इनमें एक गोल्ड और एक सिल्वर मेडल है। गोल्ड अपने साथी आसिफ के साथ मिलकर डबल्स में जीता है, जबकि सिंगल में रजत पदक हासिल किया है। अब तक अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में छह पदक जीत चुका हूं। इनमें 1 गोल्ड, 1 सिल्वर और 3 ब्रांज हैं। आगे भी मैं अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लेता रहूंगा और देश के लिए पदक जीतता रहूंगा।

Q. आपके नेतृत्व में खिलाडिय़ों किस तरह तैयार हो रहे है?
A. मुझसे ट्रेनिंग ले रहे खिलाडिय़ों की तैयारियों को आप नानाखेड़ा मैदान में देख सकते हैं। मेरी ट्रेनिंग में करीब 30 युवा खिलाड़ी तैयार हो रहे हैं। इनमें से कुछ विजयराजे सिंधिया स्टेडियम कोर्ट में चल रही 58वीं जीएच रायसोनी मेमोरियल राज्य स्तरीय जूनियर स्टेट बैडमिंटन चैंपियनशिप में भाग ले रहे हैं और अपनी-अपनी श्रेणी में शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। मेरा मानना है—‘मैंने जो सीखा, वो अब बच्चों को सिखा रहा हूं। हौसले की यह बैटन आगे पहुंचाना है।’

Q. पैरा खिलाड़ी के तौर पर आपकी सरकारों और खेल संगठनों से क्या अपेक्षा है?
A. अभी तक हमें अपेक्षा अनुरूप सहयोग नहीं मिला है। इस कैटगरी में अब भी हालात निराशाजनक हैं। ‘पैरा खिलाडिय़ों की मेहनत और मेडल किसी सामान्य खिलाड़ी से कम नहीं होती। उन्हें सामान्य खिलाडिय़ों की तरह प्रोत्साहन नहीं मिलता। यदि हमें मिलने वाली सुविधाएं बढ़ती है तो हम देश को कई और मेडल दिला सकते हैं।’

Q. आपका निजी जीवन और कोचिंग की प्रेरणा क्या रही?
A. हादसे के बाद मैं कुछ समय के लिए मानसिक रूप से टूट गया था, लेकिन बैडमिंटन ने नई जिंदगी दी। अब खेलने के साथ कोचिंग भी दे रहा हूं। इंदौर में अपना समय और हुनर खिलाडिय़ों को देना शुरू किया है।

Q. सरकार और समाज से क्या उम्मीद रखते हैं?
A. राहुल बेहद साफ शब्दों में कहते हैं, ‘हम हाथ से नहीं, हौसलों से खेलते हैं। जरूरत है तो बस थोड़े भरोसे और सहयोग की। सरकार यदि पैरा खिलाडिय़ों के लिए इनामी राशि, कोचिंग सपोर्ट और सरकारी नौकरी जैसी स्कीम लागू करे, तो हम देश के लिए ओलंपिक जैसे मंचों पर इतिहास रच सकते हैं।’

Q. युवाओं के लिए क्या संदेश है?
A ‘कभी भी हार मत मानो। शरीर में कुछ कमी हो सकती है, लेकिन मन और इरादों में नहीं। एक हाथ से मैंने जो किया, वह तुम दोनों हाथों से कर सकते हो। मैदान में उतरो, जीत खुद आगे आएगी।’

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