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FSII: बीज बाजार में तेजी, 2030 तक 5 अरब डॉलर का होगा कारोबार

भारत के GDP में खेती का हिस्सा भले ही घट रहा हो, लेकिन बीज का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। इस समय बीजों का भारतीय बाजार करीब 3.6 अरब डॉलर का है। इसके साल 2030 तक बढ़ कर पांच अरब डॉलर तक पहुंच जाने का अनुमान है। इसके साथ वैश्विक बीज बाजार में भी भारत की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ेगी। यह कहना है फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री इन इंडिया या FSII का।

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  • ग्लोबल सीड मार्केट में बढ़ेगी हिस्सेदारी

फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया की 10वीं वार्षिक आम बैठक के अवसर पर नई दिल्ली में गुरुवार को ‘एफएसआईआई नॉलेज डे 2026’ का आयोजन किया गया था। इस अवसर पर संगठन के चेयरमैन और सवाना सीड के MD&CEO अजय राणा ने बताया कि भारत को वैश्विक बीज बाजार में अग्रणी देशों की कतार में लाने की तैयारी है। इसके लिए भारतीय बीज उद्योग ने साल 2035 तक वैश्विक बीज व्यापार में देश की हिस्सेदारी मौजूदा करीब एक प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा है। उद्योग का कहना है कि इसके लिए घरेलू अनुसंधान और नई बीज तकनीकों में निवेश बढ़ाने की तो जरूरत है ही। इसके साथ ही सरकार को ऐसी नीतियां भी बनानी होगी जो कि इनोवेशन और इस सेक्टर में दीर्घकालिक निवेश को प्रोत्साहित करें।

  • तेजी से बढ़ रहा है बाजार

राणा ने बताया कि इस समय बीज का भारतीय बाजार करीब 3.6 अरब डॉलर का है। इसके साल 2030 तक 5 अरब डॉलर से अधिक के होने की संभावना जतायी जा रही है। संगठन का मानना है कि तिलहन और दलहन जैसी महत्वपूर्ण फसलों में देश को आत्मनिर्भर बनाने तथा किसानों को बेहतर बीज उपलब्ध कराने में निजी क्षेत्र की अनुसंधान क्षमता महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उनका कहना है कि वैश्विक बीज बाजार में बड़ी भूमिका निभाने के लिए जरूरी वैज्ञानिक क्षमता, प्रतिभा और विशाल किसान आधार मौजूद है। उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से उच्च उपज वाले बीजों को बढ़ावा देने के लिए शुरू किए गए प्रयासों से इस दिशा में नई संभावनाएं बनी हैं। अब उद्योग भी तिलहन और दलहन सहित रणनीतिक फसलों में रिसर्च एवं डेवलपमेंट पर अपना निवेश बढ़ाने के लिए तैयार है।

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  • व्यर्थ नहीं होता है R&D पर खर्च

अजय राणा का कहना है कि भारत को कृषि क्षेत्र में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने के लिए  R&D  पर खर्च बढ़ाना होगा। उनका कहना है कि इस मद में किया गया खर्च व्यर्थ नहीं जाता है बल्कि कई गुना ज्यादा का रिटर्न देता है। विकसित अर्थव्यवस्थाएं रिसर्च एवं डेवलपमेंट पर अपने जीडीपी का करीब 3 से 4 प्रतिशत खर्च करती हैं, जबकि भारत में यह स्तर अभी एक प्रतिशत से भी कम है।

  • खाद्य तेलों के मामले में हो सकते हैं आत्मनिर्भर

खाद्य तेलों के मामले में आयात पर निर्भरता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार और उद्योग मिलकर काम करें तो भारत अगले दशक में खाद्य तेलों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ी प्रगति कर सकता है। उन्होंने बताया कि उद्योग द्वारा विकसित कुछ सरसों हाइब्रिड प्रति एकड़ करीब एक टन तक उत्पादन देने में सक्षम हैं। ऐसे में उन क्षेत्रों में जहां उपयुक्त हो, गेहूं जैसी फसलों के साथ फसल पैटर्न में बदलाव कर सरसों का रकबा बढ़ाने से किसानों की आय में सुधार के साथ खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है।

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  • बीज उद्योग की तीन प्रमुख प्राथमिकताएं

FSII ने सरकार और उद्योग के लिए तीन प्रमुख क्षेत्रों को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई है:

  • नियमन को सरल और एकरूप बनाना
  • अनुसंधान और नवाचार को गति देना
  • बौद्धिक संपदा की सुरक्षा मजबूत करना

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