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रूस से डीजल खरीदने पर क्यों घिरे ट्रंप? भारत पर भी पड़ेगा असर!

रूस से तेल खरीदने के मामले में दूसरे देशों को नसीहत देने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब खुद रूसी डीजल मंगाने के फैसले को लेकर सवालों के घेरे में हैं। ट्रंप ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बातचीत के बाद रूसी डीजल की आपूर्ति का ऐलान किया है। उनका कहना है कि इससे अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिलेगी। लेकिन इस फैसले ने अमेरिकी राजनीति में विवाद खड़ा कर दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि जब रूस पर प्रतिबंध लगाने के पीछे अमेरिका की बड़ी भूमिका रही है, तो अब वह खुद रूसी ईंधन क्यों खरीदना चाहता है?

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ट्रंप के फैसले से अमेरिका में क्यों मचा बवाल?

ट्रंप के इस फैसले का विरोध केवल विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ही नहीं, बल्कि उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के कुछ नेता भी कर रहे हैं। अमेरिकी सांसदों का कहना है कि रूस से डीजल खरीदने की अनुमति देना यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिका की अब तक की नीति के खिलाफ है। सांसदों को आशंका है कि रूसी ईंधन की खरीद से रूस को आर्थिक फायदा होगा। इससे उसे यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने के लिए अतिरिक्त संसाधन मिल सकते हैं। कुछ सांसदों ने इस फैसले की कानूनी वैधता पर भी सवाल उठाए हैं और ट्रंप प्रशासन से इसे वापस लेने की मांग की है।

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यूरोप और यूक्रेन की चिंता क्यों बढ़ी?

रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई पर रोक लगाने के लिए कई प्रतिबंध लगाए थे। इसका उद्देश्य रूस पर आर्थिक दबाव बनाना था, ताकि युद्ध रोकने के लिए उस पर दबाव बढ़ाया जा सके। अब अमेरिका की ओर से रूसी डीजल की आपूर्ति को मंजूरी दिए जाने से इस रणनीति पर सवाल उठने लगे हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि अमेरिका खुद अपनी जरूरतों के लिए रूसी ईंधन खरीदता है, तो दूसरे देशों पर रूस से दूरी बनाने का दबाव कमजोर पड़ सकता है। यूक्रेन की चिंता भी इसी बात को लेकर है। रूसी तेल और डीजल की बिक्री से मिलने वाली कमाई का इस्तेमाल रूस की अर्थव्यवस्था को सहारा देने में हो सकता है। हालांकि, इस फैसले का युद्ध पर कितना असर पड़ेगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।

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आखिर ट्रंप ने रूस से डीजल खरीदने का फैसला क्यों लिया?

इस फैसले के पीछे अमेरिका में ईंधन की बढ़ती कीमतों को एक अहम वजह माना जा रहा है। डीजल महंगा होने से ट्रक परिवहन, खेती और माल की ढुलाई की लागत बढ़ जाती है। इसका असर कारोबार के साथ आम लोगों पर भी पड़ता है। अमेरिका में नवंबर में मध्यावधि चुनाव होने हैं। ऐसे में ईंधन की कीमतें राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण हैं। ट्रंप प्रशासन को उम्मीद है कि रूसी डीजल की अतिरिक्त आपूर्ति से बाजार में उपलब्धता बढ़ेगी और कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल रूसी डीजल की आपूर्ति से कीमतों में बड़ी गिरावट की गारंटी नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की उपलब्धता, परिवहन मार्गों और दूसरे भू-राजनीतिक तनावों का भी कीमतों पर असर पड़ता है।

भारत पर क्या पड़ सकता है असर?

अमेरिका का यह फैसला भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत लंबे समय से अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से कच्चा तेल खरीदता रहा है। भारतीय रिफाइनरियां कच्चे तेल को पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों में बदलती हैं। इन उत्पादों की बिक्री घरेलू बाजार के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी होती है। अमेरिका पहले भारत के रूस से तेल खरीदने पर सवाल उठाता रहा है और इस कारोबार को लेकर अतिरिक्त शुल्क लगाने की चेतावनी भी दे चुका है। ऐसे में अब अमेरिका का खुद रूसी डीजल की आपूर्ति स्वीकार करना उसकी नीति में अंतर को लेकर बहस बढ़ा सकता है।

हालांकि, इससे भारत को रूस से तेल खरीदने की पूरी छूट मिल गई है, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी। भारत पर लागू होने वाले अमेरिकी शुल्क और प्रतिबंधों को लेकर आगे क्या फैसला होता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।

क्या भारत में भी सस्ता होगा डीजल?

अमेरिका और रूस के बीच डीजल आपूर्ति से जुड़ी घोषणा के बाद भारत में भी ईंधन की कीमतों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय बाजार में डीजल तुरंत सस्ता हो जाएगा। भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय बाजार, कच्चे तेल की खरीद लागत, रिफाइनिंग, परिवहन और करों का असर पड़ता है। रूस से अतिरिक्त डीजल आने पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति की स्थिति बदल सकती है, लेकिन भारतीय पंपों पर कीमतों में कमी तभी होगी, जब इसका असर घरेलू लागत और मूल्य निर्धारण पर भी पड़ेगा।

कुल मिलाकर, ट्रंप का रूस से डीजल खरीदने का फैसला केवल ईंधन की आपूर्ति तक सीमित नहीं है। इससे अमेरिका की रूस नीति, यूक्रेन युद्ध, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और भारत की ऊर्जा रणनीति पर नई बहस शुरू हो गई है। अब यह देखना अहम होगा कि इस फैसले से अमेरिकी बाजार को कितनी राहत मिलती है और वैश्विक तेल कारोबार पर इसका कितना असर पड़ता है।

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