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मनमहेश की सेवा में लगा श्यामू कड़ी मेहनत के बाद शामिल होता है सवारी में

45 दिन विशेष देखभाल और डाइट से करते हैं तैयार एसडीएम घट्टिया पर रहती है हाथी की जिम्मेदारी

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हरिओम राय उज्जैन। बाबा महाकाल की सवारी में शामिल होने वाला श्यामू हाथी सिर्फ एक जीव नहीं शिव के मनमहेश स्वरूप का चलित सिंहासन है। अलखधाम के शक्तिसुर आश्रम में रहने वाला श्यामू अपनी पीठ पर जब मनमहेश के मुघौटे को लेकर सवारी में निकलता है तो लाखों श्रद्धालुओं की आंखें दर्शन के बाद श्रद्धा से भर उठती हैं। श्यामू को सवारी के लिए तैयार करने के लिए परदे के पीछे कितनी मशक्कत करनी पड़ती है यह बहुत कम ही लोग जानते हैं। सवारी के दौरान श्यामू को रोजाना 15 किलो गेहूं के आटे की रोटी और डेढ़ क्विंटल गन्ना खिलाया जाता है।

श्री महाकालेश्वर की पहली सवारी में पालकी में मनमहेश निकलते हैं और दूसरी सवारी से मनमहेश हाथी पर सवार होकर निकलते हैं। इसके पीछे सवारी निकालने वालों की गहरी सोच है। दरअसल पालकी में विराजित महाकाल के स्वरूप का जो लोग दर्शन नहीं कर पाते हैं, उनको दर्शन कराने के लिए मनमहेश को दूसरी सवारी से हाथी पर चांदी के सिंहासन पर बैठाकर निकाला जाता है। इसके लिए खासतौर पर प्रशिक्षित हाथी का इंतजाम किया जाता है। एसडीएम घट्टिया पर हाथी का इंतजाम करने की जिम्मेदारी होती है। बाकायदा इसके लिए वह आदेश जारी करते हैं। 2016 के पहले तक यह काम अलखधाम आश्रम में रहने वाले रामू के जिम्मे था, अब उसके नहीं रहने पर यह जिम्मेदारी 26 साल का 5 टन वजनी श्यामू हाथी उठा रहा है।

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कैसे तैयार किया जाता है श्यामू को
मनमहेश की सवारी के लिए श्यामू हाथी को 45 दिन तक खास खुराक दी जाती है। इसमें 15किलो गेहूं के आटे के रोट, डेढ़ क्विंटल गन्ना, 50 किलो हरे चारे की पिंडी और गुड़ रोजाना श्यामू को खिलाया जाता है। श्यामू के पैरों को मजबूती देने के लिए रोजाना उसे १५ किलोमीटर की सैर कराई जाती है।

मालिश कर तैयार करते हैं सवारी के दिन

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महावत लक्ष्मीनारायण गिरी बताते हैं कि सवारी वाले दिन सुबह श्यामू को नहलाया जाता है और महाकाल के भंडार से मिले तेल से उसकी मालिश की जाती है। श्यामू की पीठ पर एक क्विंटल रूई का गद्दा रखकर हौदा बांधा जाता है और फिर उसे श्री महाकालेश्वर मंदिर परिसर के पास हाथी द्वार पर ले जाया जाता है। यहीं उस पर सिंहासन से लेकर मनमहेश की प्रतिमा विराजने की प्रक्रिया पूरी की जाती है।

कैसे विराजित होते हैं मनमहेश

श्यामू के हौदे पर सवार मनमहेश 12 फीट की ऊंचाई पर सुरक्षित रहे रहे इसके लिए चांदी के सिंहासन को नट-बोल्ट से कसा जाता है। सिंहासन की पकड़ मजबूत करने के लिए रस्सी बांधी जाती है। चूंकि मनमहेश के समक्ष हाथी पर कोई बैठ नहीं सकता, ऐसे में एक सहायक पूरे समय प्रतिमा को सहारा देने के लिए खड़ा रहता है।

वन विभाग और वैटनरी की टीम साथ रहती है

लाखों की भीड़ में श्यामू की चाल ठीक रहे, इसके लिए महावतों की पांच सदस्यीय टीम रहती है। इनकी मदद के लिए वनकर्मी ओर वैटनरी विभाग की टीम भी साथ चलती है। वनकर्मियों का दल ट्रैंक्यूलाइजर गन से लैस रहता है, ताकि आकास्मिक स्थिति होने पर श्यामू को बेहोश किया जा सके। हालांकि ऐसी स्थिति कभी नहीं बनी।

मनमहेश विराजित करने का जिम्मा पुजारी दिलीप गुरु पर

हाथी पर भगवान मनमहेश की प्रतिमा को विराजित करने की जिम्मेदारी श्री महाकालेश्वर मंदिर के पुजारी दिलीप गुरु की रहती है। सवारी के दिन वह दोपहर 3 बजे मंदिर पहुंचते हैं। यहां से मनमहेश की प्रतिमा को परदे में ढांककर नागगणेश मंदिर लाते हैं। हौदे पर सिंहासन कसवाने, गादी बिछवाने से लेकर प्रतिमा विराजित कराने की जिम्मेदारी उनकी होती है।

मनमहेश-चंद्रमौलेश्वर का स्वरूप-महत्व एक समान: दिलीप गुरु बताते हैं कि मनमहेश और चंद्रमौलेश्वर का स्वरूप और महत्व एक-सा है। सभामंडप में चंद्रमौलेश्वर और मनमहेश का पूजन एक साथ होता है। यहीं प्रक्रिया रामघाट पर भी दोहराई जाती है। भीड़ की वजह से रामघाट पर चंद्रमौलेश्वर का पूजन मनमहेश के आने तक रोका जाता है। सवारी की वापसी में भी पूजन साथ होती है। सालों से मनमहेश का पूजन करने वाले आलोक ऐरन कहते हैं मनमहेश का हाथी पर सवार होना अपने आप में विलक्षण पल होता है।

 

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