जीवन साधना पुरुष से पुरुषोत्तम बनने का मार्ग

अपनी आदतें, मान्यताएं और आकांक्षाएं तीनों को उच्चस्तरीय बनाना चाहिए
साधना शिविर में करीब 40 साधकों ने भागीदारी की
अक्षरविश्व न्यूज. उज्जैन: जीवन प्रत्यक्ष देवता है और इसकी आराधना से ही साधक पुरुष से पुरुषोत्तम बन सकते हैं। जीवन साधना को प्रति पल करना चाहिए। चौबीस घंटे साधना में जीना चाहिए। जीवन साधना पुरुष से पुरुषोत्तम बनने का मार्ग है।
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यह उद्गार देवेंद्र कुमार श्रीवास्तव जिला समन्वयक ने गायत्री शक्तिपीठ पर पुरुषोत्तम मास के अवसर पर आयोजित द्वितीय साधना शिविर के समापन में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अपनी आदतें, मान्यताएं और आकांक्षाएं तीनों को उच्चस्तरीय बनाना चाहिए। मानसिक परिष्कार के लिए योग तथा शारीरिक प्रखरता के लिए तप आवश्यक है। युग ऋषि ने जीवन उपयोगी दो तप बताएं एक समयदान दूसरा अंशदान इन्हें जीवन का अंग अवश्य बनाइए। साधना शिविर में करीब 40 साधकों ने भागीदारी की। जिन्होंने त्रिकाल ध्यान, मंत्र जप, हवन, दीपदान, श्रीमद भगवत गीता के 15वें अध्याय पुरुषोत्तम योग का अध्ययन – विवेचन, रुद्राभिषेक के साथ जीवन देवता की आराधना संबंधी व्याख्यान में भागीदारी की। एम .एल . रणधवल ने विदाई गीत प्रस्तुत किया। संचालन नरेन्द्र सिंह सिकरवार ने किया।