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डांडिया : ‘शक्ति की भक्ति’ से राजनैतिक फल की कामना

‘चंदे की रसीदों’ से व्यापारियों और उद्योगपतियों का सामना

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शारदीय नवरात्र में देवी की आराधना के साथ गरबा-डांडिया की धूम है। दो वर्ष बाद पूरा शहर शक्ति की भक्ति में रमा है। वहीं धार्मिक आयोजनों को इवेंट का स्वरुप देकर अपने राजनैतिक हित साधने के मौके भला हमारे नेता कैसे छोड़ सकते हैं।

उनके लिए तो यह मौका है शक्ति प्रदर्शन का, भीड़ इक_ी करने का, अपना चेहरा और नाम चमकाने और जो नेता लूप लाइन में है उनके लिए राजनैतिक भविष्य तलाशने का। खेर यह सब करना और सोचना मानव स्वभाव ही है लेकिन अपनी महत्वाकांक्षाओं का बोझ बेवजह किसी दूसरे पर डाल देने से विरोध के स्वर बुलंद होना तो लाजमी ही है।

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नवरात्रि में आयोजकों के ‘डांडिया’ की ‘अभिव्यति’ के ‘नवरंग’ की ‘रिदम’ का आनंद शहर के उद्योगपतियों, दुकानदारों, बिल्डरों, दवा व्यवसाइयों, नर्सिंग होम संचालकों, होटल व्यवसाइयों एवं अन्य व्यापारों से जुड़े लोगों की जेबों पर ‘भारी’ पढ़ रहा है। मां अम्बे को ‘भक्ति’ से प्रसन्न होने वाला देवी माना गया है, लेकिन कुछ हैं जो ‘धन’ अर्जित करने में अपनी अपनी ‘शक्ति’ लगा रहे हैं। नवरात्रि शुरू होते ही आयोजनों के नाम पर जम कर मनी कलेक्शन शुरू है।

शहर के अधिकतर बडे गरबा/डांडिया आयोजनों में ‘राजनीतिक संरक्षण’ है। संस्थाओं से किसी न किसी ‘रसूखदार’ का नाम जुड़ा है। ऐसे में चंदे के लिए ‘प्रभाव-दबाव’ बनाया जा रहा हैं। गरबा आयोजकों का अपना और भाई साहबों का ‘नाम’ चमकाने की कीमत व्यापारी-उद्योगपति चुका रहे हैं। हालात यह है कि व्यापारी चंदाखोरी के बारे में सच बोलने से भी डर रहे हैं। व्यापारी ‘भय और संबंध’ बिगडऩे की आशंका में खुलकर बोलने से डरते हैं।

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चर्चा होने या करने पर इसे ‘व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर दी जाने वाली ‘सहयोग राशि’ कहकर टाल देते हैं। तो वहीं कुछ लोग नाम गोपनीय रखने की शर्त पर अपनी पीड़ा खुल के व्यक्त कर देते हैं। शहर का एक भी व्यापारिक क्षेत्र ऐसा नहीं है,जहां इन आयोजकों ने ‘रसीदें’ ना काटी हो।

चंदे के लिए आयोजक ‘अपने प_ों’ को भेज रहे हैं। बात नहीं बनने पर ‘भाई साहब’ से फोन लगवा रहे हैं। इन हालातों में शहर के व्यापारी जगत के लिए लग भग हर बड़े गरबा आयोजनों को ‘फाइनेंस’ करना मजबूरी हो गया है क्यूंकि कुछ आयोजनों से वर्तमान के ‘प्रभावशाली’ लोग जुड़ें हैं तो कुछ से पूर्ववर्ती या भविष्य में प्रभावशाली हो सकने वाले लोग।

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