डोंगला को भी मिला विज्ञान केंद्र सीएम डॉ. यादव ने किया शुभारंभ

विज्ञान और आध्यात्म का संगम : उज्जैन को वैश्विक समय रेखा रूप में स्थापित करने की बड़ी कोशिश
अक्षरविश्व न्यूज उज्जैन। तारामंडल में साइंस सेंटर की सुविधा देने के बाद महिदपुर तहसील के डोंगला में भी शनिवार को साइंस सेंटर का शुभारंभ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किया। तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘महाकाल : द मास्टर ऑफ टाइमÓ में शामिल होने पहुंचे सीएम डॉ. यादव ने कहा कि चंद्रयान-३ जैसी उपलब्धियां युवाओं को विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान के लिए प्रेरित करती है। कर्क रेखा पर स्थित डोंगला इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
इस मौके पर डोंगला में विशेष प्रदर्शनी भी लगाई गई। इसमें भारत के गौरवशाली संस्थानों इसरो, डीआरडीओ, ब्रह्मोस एयरोस्पेस, सीएसआईआर और आईआईटी इंदौर ने अपनी उपलब्धियों को प्रदर्शित किया। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य आम जनता और छात्रों को भारतीय काल गणना, अंतरिक्ष विज्ञान और ब्रह्मंड के रहस्यों से परिचित कराना है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर की पुस्तक प्रदर्शनी भी आगंतुकों के आकर्षण का केंद्र बनी।
डोंगला का महत्व : क्यों चुना गया यह स्थान?
डोंगला भौगोलिक स्थिति के कारण खगोल विज्ञान और ज्योतिष क्षेत्र में विशेष महत्व रखता है। यह गांव कर्क रेखा (टॉपिक ऑफ कैंसर) पर स्थित है। खगोल विज्ञान और ज्योतिषीय गणना के लिए यह स्थान विश्वभर में अद्वितीय है। 2013 में यहां स्थापित वराहमिहिर खगोलीय वेधशाला वैश्विक पटल पर चमकने के लिए तैयार है। सरकार की इस विशेष पहल का लक्ष्य डोंगला को दुनिया की मुख्य समय रेखा (ग्लोबल मेरिडियन) के रूप में प्रतिष्ठित करना है, जिससे भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के बीच एक मजबूत सेतु का निर्माण हो सके।
विद्यार्थियों के लिए सजेगी नक्षत्रों की पाठशाला
सम्मेलन में आरसी प्लेन निर्माण और सैटेलाइट मेकिंग जैसी उन्नत कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं। रात्रि के समय ग्रहों और डीप स्काई ऑब्जर्वेशन के जरिए विद्यार्थियों को ब्रह्मंड की गहराइयों को समझाया जा रहा है।
कुल्हाड़ी से शुरू हुई रक्षा प्रणाली अब एआई-परमाणु हथियारों तक पहुंची

उज्जैन। जो पृथ्वी की कक्षा को नियंत्रित करता है, वही अंतरिक्ष और अंतत: पूरी पृथ्वी पर प्रभुत्व रखता है और जिसने पृथ्वी पर विजय पा ली, वही मानवता का सच्चा संरक्षक है।
यह विचार नीति आयोग के सदस्य और डीआरडीओ के पूर्व महानिदेशक डॉ. वी.के. सारस्वत ने कही। वे शनिवार को उज्जैन में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइमÓ के तीसरे सत्र को संबोधित कर रहे थे। डॉ. सारस्वत ने रक्षा तकनीक पर बोलते हुए कहा कि मानव सभ्यता ने रक्षा की शुरुआत कुल्हाड़ी जैसे साधारण औजार से की थी, आज यह ड्रोन तकनीक तक पहुंच गई है। उन्होंने कहा कि आने वाला समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित न्यूरोलॉजिकल हथियारों का होगा। जैमिंग तकनीक में भारत की बढ़ती शक्ति का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह प्रणाली गेम-चेंजर साबित हुई थी।
बचपन की उस खबर ने बना दिया मिसाइल मैन
डॉ. सारस्वत ने अपने संबोधन की शुरुआत कहानी से की। उन्होंने बताया कि जब वे महज 12 वर्ष के थे, तब पिता ने उन्हें रूस के सैटेलाइट परीक्षण की खबर दिखाई थी। उसी एक खबर ने उनके मन में अंतरिक्ष विज्ञान के प्रति जिज्ञासा पैदा की थी। वे आगे चलकर भारत के पृथ्वी मिसाइल सिस्टम और बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा कार्यक्रम के सूत्रधार बने। वर्तमान में वे ऊर्जा और सुपरकंप्यूटिंग जैसे राष्ट्रीय मिशनों का नेतृत्व कर रहे हैं।
विज्ञान और आध्यात्म का संगम है उज्जैन
कार्यक्रम में डॉ. शंकर नाखे (पूर्व निदेशक, राजा रमन्ना सेंटर फॉर एडवांस्ड टेक्नोलॉजी) ने लेजर तकनीक और परमाणु ऊर्जा पर 35 वर्षों के अनुभव साझा किए और उज्जैन को विज्ञान और आध्यात्म का संगम बताया।









