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महावीर तपोभूमि पर हुआ आचार्य पुष्पदंत सागर महाराज का ससंघ मंगल प्रवेश

अक्षरविश्व न्यूज. उज्जैन:महावीर तपोभूमि पर गत दिनों गुरुदेव आचार्य पुष्पदंत सागरजी महाराज का ससंघ मंगल प्रवेश हुआ। आचार्य प्रज्ञा सागरजी महाराज स्वयं अपने गुरुदेव को लेने के लिए इंदौर रोड पर चौराहे पर पहुंचे और वहां पर नमोस्तु प्रणाम करते हुए ससंघ मंगल प्रवेश कराया।

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आचार्य गुरुदेव पुष्पदंत सागरजी महाराज 13 साल के बाद उज्जैन की धर्मधारा तपोभूमि पर आए। तपोभूमि पर संपूर्ण जैन समाज द्वारा पलक पावड़े बिछाकर गुरुदेव की अगवानी की। बैंड बाजे धर्म ध्वज के साथ-साथ महिलाएं लाल साड़ी में विशेष वेशभूषा में सर पर कलश लिए आगे-आगे नाचते हुए चल रही थी तो वहीं पुरुष श्वेत वस्त्र में संपूर्ण संघ के साथ चल रहे थे। आचार्य गुरुदेव पुष्पदंत सागर महाराज एवं संघ का जगह-जगह पाद पक्षालन हुआ तत्पश्चात गुरुदेव की भव्य अगवानी तपोभूमि पर तपोभूमि परिवार द्वारा की गई। आचार्य प्रज्ञा सागर महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि मेरे गुरुदेव की बात अनोखी है वह नाना करते हुए भी उज्जैन तपोभूमि पर पधारे एवं हमें आशीर्वाद दिया उनका आशीर्वाद हम पर सदा बना रहता है।

इनके आशीर्वाद से ही आज हम धर्म मार्ग पर चल रहे हैं एवं लोगों को धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे रहे हैं। उनका उज्जैन आना बड़े सौभाग्य का दिन है। उन्होंने पहले उज्जैन आने के लिए स्वीकृति प्रदान नहीं की थी लेकिन मेरे अनुरोध पर वह स्वयं इंदौर से उज्जैन की और विहार करते हुए तपोभूमि पहुंचे और हम सबको आशीर्वाद दिया। कार्यक्रम में विशेष रूप से संस्थापक अध्यक्ष अशोक जैन चायवाला, अध्यक्ष दिनेश जैन, सचिव संजय बडज़ात्या, कोषाध्यक्ष देवेन्द्र सिघंई, इंदरमल जैन, गिरीश बिलाला, गुरुकुल संयोजक राजेन्द्र लुहाडिय़ा एवं प्रज्ञा कला मंच अध्यक्ष निशि जैन, सचिव रश्मि सेठी, प्रज्ञा युवा मंच अध्यक्ष पलाश लुहाडिय़ा, सचिव निखिल विनायक, प्रज्ञा पुष्प मंच अध्यक्ष अवनी जैन, तनिषा जैन, प्रज्ञा बाल मंच अध्यक्ष काव्य सेठी, आराध्य जैन आदि उपस्थित थे।

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मैं दौड़ता हुआ चला आया

आचार्य पुष्पदांत सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि अपनों का सम्मान कोई बड़ी बात नहीं लेकिन सम्मान है समर्पण का, सम्मान है अनुशासन का, सम्मान है प्रेम का, सम्मान है प्रज्ञा का। सम्मान उसका किया जाता है जो परिपूर्ण होता है चाहे वह अपना हो या पराया। प्रज्ञा सागर ने आज मुझे समर्पण भाव से सम्मान से तपोभूमि बुलाया और मैं दौड़ता हुआ चला आया।

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