करोड़ों रुपए का बजट… फिर भी मरीजों के हाथों में रोटियां, सरकारी अस्पतालों में थाली तक नसीब नहीं

अक्षरविश्व न्यूज इंदौर। मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी और स्वच्छता में नंबर-1 इंदौर के सरकारी अस्पतालों से मानवता को शर्मसार करने वाली तस्वीर सामने आई है। सरकार स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर हर साल करोड़ों का बजट जारी करती है, लेकिन हकीकत यह है कि एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े बड़े अस्पतालों में मरीजों को सम्मान के साथ थाली में भोजन तक नसीब नहीं हो रहा। मजबूरन गरीब मरीजों को हाथों में रोटियां और प्लास्टिक के छोटे डिब्बों में सब्जी लेनी पड़ रही है।
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एमवाय अस्पताल, एमटीएच और कैंसर अस्पताल जैसे बड़े केंद्रों में प्रशासन ने एक अजीबोगरीब नियम लागू कर रखा है। कुछ समय पहले हुए ‘चूहाकांड’ का हवाला देकर संक्रमण रोकने के नाम पर मरीजों के परिजनों को बाहर से अपने बर्तन या डिब्बे लाने पर रोक लगा दी गई है। अस्पताल के गेट पर ही बर्तन छीन लिए जाते हैं, लेकिन विडंबना देखिए कि अस्पताल परिसर के अंदर ही मौजूद कैंटीन से प्लास्टिक के डिब्बे खरीदने की पूरी छूट है। दूर-दराज से आए गरीब परिवारों पर हर दिन नया डिब्बा खरीदने का अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाला जा रहा है।
दावों और हकीकत के बीच बड़ी खाई
प्रदेश सरकार लगातार स्वास्थ्य सेवाओं के आधुनिकीकरण और नए अस्पताल खोलने के दावे करती है। इंदौर जैसे महानगर में जहां मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देने की बात होती है, वहां मरीजों को बुनियादी ‘थाली’ न दे पाना सिस्टम की बड़ी नाकामी है। जिम्मेदार अधिकारी ‘संक्रमण’ का बहाना बनाकर अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ रहे हैं, जबकि हकीकत में यह अव्यवस्था गरीब मरीजों के आत्मसम्मान पर सीधा प्रहार है।
हॉस्पिटल्स में भोजन वितरण का जिम्मा खजराना गणेश मंदिर ट्रस्ट के पास है। व्यवस्था ऐसी है कि खाना सिर्फ उन्हीं को मिलता है जिनके पास खुद का बर्तन हो। जिन लाचार मरीजों के पास बर्तन नहीं होता, उन्हें सब्जी तक नहीं मिल पाती। धार से आए एक मरीज के परिजन ने दर्द बयां करते हुए कहा, ‘हम इलाज कराने आए हैं या रोज नए डिब्बे खरीदने? हाथ में रोटी लेकर खाना खिलाना किसी अपमान से कम नहीं है, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है।’
हैरानी की बात यह है कि इसी एमजीएम मेडिकल कॉलेज के अंतर्गत आने वाले सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल में मरीजों को थाली दी जाती है और कर्मचारी ही उन्हें साफ करते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब एक ही प्रबंधन के एक अस्पताल में थाली मिल सकती है, तो एमवाई और चाचा नेहरू जैसे अस्पतालों में मरीजों को जानवरों की तरह हाथ में रोटियां क्यों थमाई जा रही हैं?









