रंग पंचमी कब है? जानें तिथि, पूजा विधि और शुभ मूर्हुत

रंग पंचमी, जिसे रंगों का त्योहार भी कहा जाता है, भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह त्योहार होली के बाद मनाया जाता है और इसका विशेष महत्व है। रंग पंचमी का उत्सव रंगों, खुशियों और भाईचारे का प्रतीक है। इस दिन लोग एक-दूसरे पर रंग डालते हैं, गाते-बजाते हैं और एक-दूसरे के साथ मिलकर आनंदित होते हैं। यह पर्व न केवल रंगों का उत्सव है, बल्कि यह प्रेम, एकता और सामाजिक समरसता का भी संदेश देता है। रंग पंचमी का आयोजन हर साल फाल्गुन मास की पंचमी तिथि को किया जाता है, जो होली के बाद आता है।इस अवसर पर विशेष व्यंजन जैसे पूरनपोली बनाए जाते हैं। रंग पंचमी का त्योहार भाईचारे और प्रेम का प्रतीक है, जो लोगों को एकजुट करता है और आनंद फैलाता है। यह दिन न केवल रंगों का उत्सव है, बल्कि आपसी संबंधों को मजबूत करने का भी अवसर है।
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रंग पंचमी 2026 कब है?
रंग पंचमी 2026 में 8 मार्च को मनाई जाएगी। यह त्योहार होली के पांच दिन बाद आता है रंग पंचमी का दिन रंगों के खेल का प्रतीक है
यह है रंग पंचमी का शुभ मुहूर्त
रंग पंचमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5 बजकर 1 मिनट से लेकर 5 बजकर 50 मिनट तक रहेगा. वहीं अभिजित मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 8 मिनट से लेकर 12 बजकर 56 मिनट तक रहेगा. इसमें विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 30 मिनट से शुरू होगा. 3 बजकर 17 मिनट तक रहेगा. वहीं गोधूलि मुहूर्त शाम 6 बजकर 23 मिनट से लेकर 06 बजकर 47 मिनट तक रहेगा. इन सभी शुभ मुहूर्त में भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की पूजा अर्चना करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है. इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा अर्चना करने से सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं.
क्यों मनाते हैं रंगपंचमी?
प्रचलित कथाओं के अनुसार हिरण्यकश्यिपु नाम का एक राक्षस था जो भगवान विष्णु को अपना दुश्मन मानता था। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। जब ये बात हिरण्यकश्यिपु को पता चली तो उसने अपने पुत्र को मारने के लिए कईं प्रयास किए लेकिन वह असफल रहा। अंत में उसने प्रह्लाद को मारने के लिए अग्नि में अपनी बहन होलिका के साथ बैठा दिया। 5 दिन तक प्रह्लाद और होलिका अग्नि में बैठे रहे। इस दौरान होलिका का अंत हो गया और प्रह्लाद जीवित बच गए। जब लोगों ने ये देखा तो उनमें उत्साह और हर्ष छा गया और सभी ने रंग-गुलाल से उत्सव मनाया। तभी से रंगपंचमी का पर्व मनाया जा रहा है।
रंग पंचमी का महत्व
मान्यता है कि रंग पंचमी पर देवलोक से देवी-देवता धरती पर आते हैं और भक्तों के साथ रंगों का उत्सव मनाते हैं. इसी कारण इस पर्व को देवताओं की होली से भी जाना जाता है. रंग पंचमी से जुड़ी मान्यता यह भी है कि द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने राधा रानी के साथ होली खेली थी और इस होली में जहां देवी-देवताओं ने उन पर पुष्प की वर्षा की थी. राधा-कृष्ण की इस होली में उनके साथ ग्वाले और गोपियों ने भी रंगोत्सव मनाया था. कुछ इसी आस्था को लिए लोग इस दिन भगवान श्री कृष्ण और राधा की विशेष रूप से पूजा करते हैं और देवी-देवताओं का ध्यान करते हुए हवा में अबीर और गुलाल फेंकते है.
रंग पंचमी पूजा विधि
स्नान और संकल्प: रंग पंचमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें. इसके बाद पूजा का संकल्प लें.
स्थापना: एक चौकी पर गंगाजल छिड़कें. फिर उस पर पीला या लाल कपड़ा बिछाकर लक्ष्मी-नारायण की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें.
अभिषेक: भगवान को जल और पंचामृत से स्नान कराएं.
अर्पित करें ये चीजें: भगवान को अक्षत, रोली, धूप, बाती, चंदन, फूल और फल अर्पित करें.
भोग: भगवान को गुड़-चना, मिश्री या खीर का भोग लगाएं.
रंग अर्पण: भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी को गुलाल और अबीर अर्पित करें.
मंत्र उच्चारण: भगवान कृष्ण और राधा रानी के मंत्रों का जाप करें.
आरती: अंत में घी का दीपक जलाकर आरती करें और सुख-समृद्धि की कामना करें.
देवी दु्र्गा ने किया था असुरों का वध
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार रंग पंचमी के दिन ही मां दुर्गा ने राक्षसों का वध किया था और उसके बाद अपने भक्तों के साथ विजय के प्रतीक के रुप में होली खेली थी। यही कारण है कि इस दिन को बुराई पर अच्छाई का जीत का पर्व माना जाता है।









