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पर्युषण पर्व पर विशेष : ‘अक्षरविश्व के लिए पर्युषण पर्व पर मुनिश्री सुप्रभसागजी की कलम से’

जैन धर्म का सबसे बड़ा पर्वराज पर्युषण: मुनिश्री सुप्रभसागर जी

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पर्युषण महापर्व में दसलक्षण पर्व की शुरुआत हो रही है। इस मौके पर अक्षरविश्व के विशेष आग्रह पर मुनिश्री सुप्रभसागर जी की लेखनी से पर्वराज पर्युषण और दसलक्षण पर्व की विशेष प्रवचन माला प्रकाशित की जा रही है….

आ त्मा साधकों को सिद्धि का सबसे बड़ा सोपान है पर्वराज पर्युषण। पर्व अर्थात जोड़, जो स्वयं से स्वयं को जोड़ता है, जो आत्मा को परमात्मा से जुडऩे का अवसर प्रदान करता है। संसार में अनेक प्रकार के पर्व मनाये जाते हैं। किसी ने मौज-मस्ती को पर्व की संज्ञा दी तो किसी ने बाह्य प्रदर्शन को पर्व की संज्ञा दे दी। ये पर्व, पर्व हो ही नहीं सकते। क्योकि पर्व तो वह है जो हमेें आत्म कल्याण की और अग्रसर करता है। जो पर्वों का राजा है ऐसा यह पर्युषण पर्व है। जो आत्मा को परि अर्थात चारों और से उष्णता प्रदान करता हैं। उसका नाम है पर्युषण। अनेक प्रकार के पर्व लौकिकता में प्रचलित है, किसी ने भोजन के त्याग को पर्व के दिनों मे मुख्यता दी तो किसी ने मात्र क्रियाओं में आनंद मनाना पर्व मान लिया। दिनभर भूखे रहना और रात्रि पर्यंत भोजन करना इसका नाम भी पर्व नहीं है।

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वास्तविक पर्व तो वही हैं जिसमें आत्मा का पोषण होता है और जहां आत्मा का पोषण होगा वह शरीर का पोषण तो होता ही है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए श्रावक-श्राविकागण साधु समूह, अबाल-वृद्ध श्रद्धालुजन इन पर्व के दिनों में एकासन, उपवास रूप अनेक प्रकार की त्याग, तपस्या करते हुए आत्म धर्म तक पहुंचने का प्रयास करते हैं। धर्म के दस लक्षणों को प्राप्त करने का यहां पुरुषार्थ होता है।

इसलिए यह पर्वराज पर्युषण-उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य, ब्रह्मचर्य रूप दस लक्षण के नाम से भी जाना जाता है। ये आत्मा के दस लक्षण, आत्मधर्म रूप होने से ही इसे दस लक्षण धर्म कहा जाता है। जिनागम में दिगम्बर अम्नाय के अनुसार ये पर्व उत्तम क्षमा से प्रारंभ होकर उत्तम ब्रह्मचर्य पर्यंत दस दिनों तक मनाये जाते हैं, जो प्रतिवर्ष माघ, चैत्र एवं भाद्रपद माह में तीन बार आते हैं। भाद्रपद माह में मुख्यता से काल परिवर्तन के निमित्त अत्यंत उत्साह पूर्व मनाये जाने वाला पर्व है। क्योंकि पर्व भी नैमित्तक एवं शाश्वत के भेद से दो प्रकार के होते हैं।

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उत्तम क्षमा: सभी को जीतने का एक मात्र उपाय क्षमा है…

”कालुष्यानुत्पत्त क्षमा” कलुष्ता उत्पन्न नहीं होने देना इसका नाम क्षमा है। क्षमा चैतन्य आत्मा का सदस्य है, वह परिवार है और कषाय मेहमान है, एक छोटा बालक भले ही व्याख्या न कर सके पर उसे पता होता है कि क्रोध (कषाय) आती है और क्षमा होती है, जैसे एक परिवार का सदस्य जो होता है वह तो होता ही और मेहमान आता है चला जाता है। यदि मनुष्य के मन में कषाय उत्पन्न न हो तो क्रोध नहीं आता। चार गतियां है तो चार कषायें भी है। तिर्थंचगति में जहां मायाचारी की मुख्यता है तो नरक गति में क्रोध की मुख्यता है। लोभा कषाय देवों में प्रचुरता से है तो मान कषाय मनुष्य को दुर्गति में ले जोन का साधन बनती है। पर्वराज पर्युषण का प्रथम दिवस जो उत्तम क्षमा धर्म से प्रारंभ होता है। दस लक्षण धर्म के पहले दिन उत्तम क्षमा धर्म को भले ही लिया है लेकिन क्षमा धर्म में ही सम्पूर्ण धर्म के दस लक्षण समाहित है।

मानी व्यक्ति यही सोचता है कि मैं किसी को क्षमा कर दूंगा तो सामने वाला भी यही सोचेगा कि देखो मुझसे दुर्बल है इसलिए क्षमा मांग रहा है। लेकिन वास्तव में क्षमा वही कर सकता है जो विनयगुण से युक्त है। मृदुता जिसके पास है वहीं क्षमा मांग सकता है और क्षमा कर सकता है। क्षमा के अभाव में संयम का पालन नहीं होता और संयम के बिना तप, त्याग सबकुछ व्यर्थ है। परिग्रही व्यक्ति क्षमाशील हो ही नहीं सकता क्योंकि परिग्रह को जोडऩे में संलग्नव्यक्ति तृष्णा के वश समस्त पाप करता है और ब्रह्मचर्य के निर्देश पालन करने के लिए हृदय में क्षमा होना आवश्यक है। उत्तम क्षमा को समझने से पहले क्रोध कषाय को भी समझना आवश्यक है।

क्रोध को जीतने का यदि कोई उपाय है तो क्षमा है। छोटी-छोटी बातों में व्यक्ति क्रोध कर बैठता है। जबकि कई बार तो व्यक्ति को पता ही नहीं होता कि मैं क्रोध कर रहा हूं तो क्यों कर रहा हूं। शारीरिक दुर्बलता होने के कारण व्यक्ति क्रोध करता है तो कभी भोग-उपभोग की सामग्री प्राप्त नहीं होने पर क्रोध करता है। कई ऐसे कारण होते हैं कि व्यक्ति क्रोध करते हुए अपने जीवन का सर्वस्व नष्ट कर बैठता है। क्रोध को कैसे जीते ये बहुत बड़ी समस्या है। प्रत्येक व्यक्ति के पास इसका उपाय नहीं है। इसके लिए पहले हम समझने का प्रयास करें कि मुझे क्रोध क्यों आ रहा है? जब आप समझेंगे तो उसे जीतने का प्रयास करेंगे क्येां कि क्रोध जीतने का एक मात्र उपाय है। उसका नाम है क्षमा।

जब क्रोध आए तो मौन हो जाए, स्थान बदले, अपने उपयोग को बदलने का पुरुषार्थ करें, विचार करें उन निग्र्रथों के बारे मे जो कितनी भी विषमता आने पर उग्र नहीं होते हैं। आप भी जीवन में, मरण में, लाभ-अलाभ में मुनिराजों जैसे क्षमता रखेंगे तो अपके जीवन में भी क्षमा आ सकती है। आप अपने आप को क्षमा धारण करते हुए जीवन को सुखी और समृद्ध बना सकते हैं।

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