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1/84 महादेव : श्री अगस्त्येश्वर महादेव मंदिर

84 महादेव और मंदिरों की यात्रा

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लेखक – रमेश दीक्षित

अतीत में शिवनगरी उज्जयिनी में एक सुविस्तृत क्षेत्र महाकाल वन के नाम से जाना जाता था इसमें असंख्य शिवलिंग विद्यमान थे। स्कंद महापुराण में सनत्कुमार कहते हैं-

षष्ठि कोटि सहस्राणि षष्ठि कोटि शतानिच।
महाकालवने देवि, लिंगसंख्या न विद्यते।।

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प्रमुखत: श्रावण मास में या फिर वर्ष में कभी भी श्री अगस्त्येश्वर महादेव मंदिर ये यह यात्रा शुरू होती है तथा यही उसका समापन होता है। इन 84 महादेव मंदिरों के पौराणिक, धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व के साथ जुड़ी हैं इनके उद्भव, प्राकट्य, शिव द्वारा दैत्य-संहार या मंदिर प्रतिष्ठा की कथाएं।

भूतभावन भगवान् महाकालेश्वर मंदिर के पुरा-वैभव के साथ ही 84 महादेवों की वर्तमानता से यह अवंतिका नगरी शिवमयता का प्रतीक बन गई है। इन मंदिरों के नाम व उनके अवस्थान के संबंध में मातांतर है, फिर भी 1. कायावरोहण्ेाश्वर ( करुण कोकलाखेड़ी गांव के दक्षिण में), दुर्दरेश्वर (जैथल गांव के उत्तर में), 3. पिंगलेश्वर (पिंगलेश्वर गांव के पूर्व में) और 4. बिल्वकेश्वर (अबोधा गांव के पश्चिम) ये चारों दिशा के 4 रक्षपाल माने जाते हैं, इन्हें चार हाथ भी कहते हैं।

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84 महादेव मंदिरों की यात्रा प्रमुखत: श्रावण मास में शिवभक्तों द्वारा अधिकतर प्रात:काल में की जाती है। 4 दूर स्थित मंदिरों को छोड़कर प्राय: सभी मंदिर उज्जैन नगर सीमा या उसके आसपास ही स्थित हैं। इस यात्रा में भक्तगण किसी जानकार पंडित को साथ लेकर या स्वयं ही क्रमवार या अपनी सुविधानुसार इन शिवालयों में पहुंचकर शिव पंचायतन का पूजन करते हैं।

पूजन सामग्री में अखंड बिल्वपत्र, चंदन-कुमकुम, आंकड़े व गुलाब के पुष्प, कमल पुष्प, धतूरा फल, पंचामृत और शुद्ध जल, आंकड़े की माला, रुद्राक्ष व नैवेद्य में नारियल या मिष्ठान्न अर्पित किए जाते हैं। मंदिरों में पुजारी पूजन विधि संपन्न करते हैं।

क्र. 1/84 श्री अगस्त्येश्वर महादेव मंदिर

यह मंदिर मां हरसिद्धि मंदिर के पीछे श्री संतोष माता मंदिर कॉम्प्लेक्स में पश्चिम-दक्षिण कोण में स्थित है। मंदिर रचना-शिल्प अति प्राचीन है तथा 8वीं शताब्दी का माना जाता है। इस मंदिर का गर्भगृह जमीन की सतह से लगभग 4 फीट नीचे है। जिसके मध्य में लगभग 15 इंच ऊंचा श्यामवर्ण का शिवलिंग है जिसके चारों ओर तीन परतों में जलाधारी आवेष्टित है जो उत्तराभिमुख है। मंदिर में नियत स्थान पर गणेश, पार्वती व कार्तिकेय की मूर्तियां आलों में प्रतिष्ठित हैं।

गर्भगृह के ऊपर मंदिर के सामान्य शिखर पर गुम्बज के आकार का डोम बना हुआ है, लगता है पूर्वकाल में मुगल आक्रमणकारियों द्वारा तोडफ़ोड़ की गई थी। एक शिलालेख भी है जिस पर उर्दू में कुछ लिखा है। गर्भगृह का प्रवेश द्वार 5 फीट ऊंचा है जिसके सामने 9 स्तंभों पर सभामंडप बना है।

मंदिर का आधा निचला भाग प्राचीनता दर्शाता है व ऊपरी आधा भाग मरम्मत के कारण नया निर्माण प्रतीत होता है। मंदिर के आसपास नृत्यरत गणेश, सती की चरण-पादुका, सती स्तंभ, सती की मूर्ति, 52 देवियों की मूर्ति व 9 देवियों की अति प्राचीन प्रस्तर आकृतियां दृष्टव्य हैं। मंदिर के आसपास हनुमान, भैरव, काली व संतोषी माता के मंदिर भी दर्शनीय हैं।

इस मंदिर की कथा सुनाते हुए महादेवजी ने उमा से कहा था कि पूर्व में देवता असुरों से परास्त व निराश होकर इधर-उधर भटक रहे थे, तब उन्हें अगस्त्य दिखे। देवताओं की बात सुनकर अगस्त्य प्रलयाग्नि की तरह प्रज्वलित हो उठे जिससे दैत्य जलकर पाताल में गिर पड़े।

दैत्य-वध महापाप से पीडि़त अगस्त्य को ब्रह्म हत्या लगी जिससे मुक्ति हेतु ब्रह्मा ने उन्हें महाकाल वन में शिवलिंग की आराधना के लिए भेजा। इस अगस्त्येश्वर शिवलिंग के स्मरण मात्र से मुनष्य के करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। इसके दर्शन मात्र से ब्रह्म हत्या से मुक्ति मिल जाती है।

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