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12/84 महादेव : श्री लोकपालेश्वर महादेव मंदिर

लेखक – रमेश दीक्षित

कहां है स्थित-

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यह शिवलिंग हरसिद्धी पाल की घाटी उतरकर दायें कहारवाड़ी मार्ग पर पहले बायें मोड़ के ठीक सामने हैं। वस्तुत: यहां चौरासी मेंसे दो मंदिर पास-पास है। पहला मंदिर श्री प्रयागेश्वर (71) है जबकि दूसरा श्री लोकपालेश्वर महादेव का है।

यस्य दर्शनमात्रेण सर्वपापै: प्रमुच्यते।

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शिवलिंग वर्णन-

जिसके दर्शनमात्र से मनुष्य सर्वपापरहित हो जाता है, उसका शिवलिंग आकार में लगभग ५ इंच ऊंचा है तथा पीतल की एक चौकोर जलाधारी में स्थित है। भूरे पत्थर का यह शिवलिंग नागाकृति पीतल के घेरे से आवेष्टित है। जलाधारी की जल निकासी के मार्ग की ओर इसके कोनों पर चक्र तथा अद्र्धगोलाकृति पर शंखउत्कीर्ण हैं।

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प्रवेश करने पर बाई ओर ताक में संगमरमर निर्मित सुंदर प्रतिमा है जबकि सामने देवी पार्वती की मूर्ति है। फर्श संगमरमर का है। यहां शिवलिंग पर न तो नाग छायां किये हैं न त्रिशूल व डमरू हैं। बाहर नंदी विराजित है।

उद्भव की कथा-

महादेवजी पार्वती को कहते हैं कि एक बार हिरण्यकशिपु के वक्षस्थल से सहश्रों दैत्य प्रकट होकर ब्राह्मणों का यज्ञ ध्वंस कर उन्हें खाने लगे। तब लोकपालगण श्रीहरि की शरण में गये व रक्षार्थ प्रार्थना करने लगे। दैत्य सागर में प्रविष्ट हो गये तथा रात में ब्राह्मणों का वध करने लगे। उन्होंने इन्द्र, दक्षिणस्य यजराज, वरूण, कुबेरादि को भी परास्त कर दिया। तब विष्णु ने उन्हें महाकालवन जाकर लोकशंकर भगवान विश्वेश्वर की आराधरा करने का कहा।

किन्तु दैत्यों ने पुन: उत्पात मचाकर देवताओं पर आक्रमण किया। तब नारायण ने उन्हें पुन: महाकालवन भेजा। तब लोकपालों ने महाकापालिक वेष में उस अद्भुत तेजराशि महालिंग का दार्शन किया। तब लिंग से अग्नि ज्वाला निकली तथा दैत्यगण भस्मीभूत हो गये।

फलश्रुति-

लोकपालेश्वर महादेव के दर्शन से लोग प्रत्येक जन्म में समृद्ध होते हैं, उनको व्याधि, अकालमृत्यु तथा ऐश्वर्य का अभाव कभी नहीं होता। वह अपनी कामनानुसार वस्तु लाभ करता है। वह लोकपालों के साथ स्वर्ग में आनन्द पाता है। संक्रान्ति, सोमवार, चतुर्दशी, अष्टमी तथा दोनों अयनों में दर्शन करनेवाला शत्रुओं से कभी पराजित नहीं होता।

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