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13/84 महादेव : श्री मनकामेश्वर महादेव मंदिर

यस्य दर्शनमात्रेण सौभाग्यं जायते शुभम्।।

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लेखक – रमेश दीक्षित

यह मंदिर शिप्रा तट पर पुरानी छोटी रपट के पास 6 सीढिय़ां चढ़कर गंर्धव घाट पर स्थित है। मंदिर के दाईं ओर पीछे हटकर 21 व 70 क्रमांकों के भी मंदिर हैं। उत्तरमुखी गोलाकार 3 फीट चौड़ी जलाधारी के मध्य करीब 4 इंच ऊंचा शिवलिंग प्रतिष्ठित है।

पीतल का नाग शिवलिंग की ओर आता हुआ दृष्टव्य है। साढ़े चार फीट ऊंचे प्राचीन काले पत्थर के पश्चिमाभिमुख प्रवेश द्वार के बाईं ओर ताक में पार्वती, सामने 4 इंच ऊंचे आसन पर गणेशजी तथा ताक में ही कार्तिकेय विराजित हैं। गर्भगृह की दीवारों व फर्श पर टाइल्स लगा दिए गए हैं। 250 वर्गफीट विस्तृत खुले सहित 4 पुराने काले पत्थरों के स्तंभों के मध्य संगमरमर के नंदी विराजित हैं।

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माहातम्य की कथा-

महादेव ने पार्वती से कहा कि एक बार ब्रह्मा द्वारा प्रजा सृष्टि कार्य का प्रवर्तन न करने पर कंदर्प को शाप दिया कि तुम शिव के नेत्रों से उत्पन्न अग्नि से जलकर प्राण त्याग करोगे। तब उसने प्रणाम कर ब्रह्मा से प्रसन्न होने की प्रार्थना की। ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर कंदर्प को बारह स्थान दिए- कामिनीगण के कटाक्ष, केश, जंघा, स्तन, नाभि, बाहुमूल तथा अधर पल्लव तथा वसंत, कोकिला लाप, ज्योत्सना तथा जलदागम।

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उन्होंने उसे पुष्प धनुष तथा पांच बाण प्रदान किए। तब रति-प्रीति से युक्त कामदेव समस्त जगत को निपाडि़त करने लगा। महादेव आगे कहते हैं कि एक बार में तपस्यारत था तब कामदेव ने लीलापूर्वक मेरे हृदय में प्रवेश किया, इस पर मैं बहुत कुपित हो गया। मैंने अपने तीसरे नेत्र से उसे जला डाला। तब रति के कहने पर मैंने उसे अनंग कर दिया, उसने अवंति जाकर अनंत फलदायक परम लिंग का भक्तिभाव से दर्शन किया।

लिंग ने कामदेव से कहा कि तुमने मुझे प्रसन्न किया। तुम कृष्ण के रुक्मिणी के साथ संगम से जन्म लोगे व लोक प्रसिद्ध होगे। यह लिंग मनकामेश्वर कहा जाएगा।

फलश्रुति-

इस शिवलिंग के दर्शन मात्र से परम सौभाग्य की प्राप्ति होगी। जो इसके दर्शन करेंगे वे दीर्घायु, रूप, निर्मल, ऐश्वर्य, परमभोग, दिव्य कलान्वित स्त्री तथा निरोग सन्तति लाभ प्राप्त करेंगे। इसमें संदेह नहीं।

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