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3/84 महादेव : श्री ढुण्ढेश्वर महादेव मंदिर

लेखक – रमेश दीक्षित

श्री ढुण्ढेश्वर महादेव मंदिर रामघाट के पूर्व में तथा दत्त अखाड़ा के ठीक सामने चढ़ाव चढ़कर पहली मंजिल पर स्थित है। इसका प्रवेशद्वार उत्तरामुखी है जिसके ऊपर गणेशजी की मूर्ति है। मंदिर का शिल्प प्राचीन और अर्वाचीन का मिला-जुला भवन दिखाई देता है। प्राचीन स्तंभों पर नवीन जीर्णोद्धार स्पष्ट दृष्टव्य है।

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मंदिर में गर्भगृह में 1 फीट ऊंचा शिवलिंग है जो नागवेष्टित है। यहां गणेश व पार्वती की मूर्तियां स्थापित हैं किंतु कार्तिकेय की प्रतिमा दिखाई नहीं दी। शिवलिंग पीतल की जलाधारी में स्थापित है। शिवलिंग के सामने नंदी विराजित हैं जिसके ऊपर चार स्तंभों पर छत बनी हुई है।

ढुण्ढेश्वरं तृतीयं तु सुखस्वर्गफलप्रदम।
सर्वपापहरं लिड्गं नृणां दुष्कृतनाशनम।।

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स्कंद पुराण के अनुसार भगवान शिव का कैलाश स्थित एक गणनायक ढुण्ढ एक बार जब काम भावना के वशीभूत होकर चुपके से इन्द्र लोक जाकर रंभा नाम की अप्सरा का नृत्य देखते-देखते छेड़छाड़ करने लगा।

ढुण्ढ की हरकत से कुपित होकर इन्द्र ने उसे पतन होने का शाप दे दिया जिससे मुक्त होने के लिए उसने कई प्रसिद्ध तीर्थ स्थानों पर साधना उपासना की किंतु इस बीच हुई आकाशवाणी से उसे निर्देश मिला कि महाकाल वन में शिप्रा किनारे रामघाट के पास स्थित सर्वाथ साधक शिवलिंग की उपासना करो तो ही देवराज इंद्र के शाप से मुक्त हो सकोगे।

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ढुण्ढ ने मन, क्रम और वचन तथा श्रद्धा भक्ति के साथ महाकाल वन स्थित उस सर्वाथ साधक लिंग की उपासना की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसके पाप नष्ट करते हुए उसे वर मांगने को कहा।

तब कृतकृत्य होकर भक्त ढुण्ढ ने निवेदन किया कि हे प्रभु! मेरे नाम से आपके नाम की प्रसिद्धि हो, आप इस स्थान पर सदा निवास करें। तभी से यह लिंग ढुण्ढेश्वर नाम से प्रसिद्ध हो गया जिसके दर्शन मात्र से भक्तगण सिद्धि को प्राप्त कर सकते हैं।

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