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37/84 महादेव : श्री शिवेश्वर महादेव मंदिर

मोक्षंदुर्लभंमत्वासंसारंचातिभीषणम्।
अपुनर्भवहेतुत्वात्संसेण्यो ड सौशिवेश्वर:।।

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लेखक – रमेश दीक्षित

(अर्थात मोक्ष दुर्लभ है। संसार अत्यंत भीषण है तथा शिवेश्वर लिंग पुनर्जन्मनाशक है। यह जानकर लोगों को इस लिंग की सेवा करनी चाहिए।)

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विष्णु सागर उद्यान के उत्तर में स्थित लगभग 1 हजार वर्ष पुरातन श्रीराम जनार्दन मंदिर परिसर में श्रीराम मंदिर व बावड़ी के मध्य मंदिर के नीचे के फर्श पर श्री शिवेश्वर महादेव छोटे से मंदिर में विराजित हैं। करीब 40 इंच ऊंचे काले पत्थर के पूर्वाभिमुख प्रवेश द्वारा के भीतर लोहे का द्वार है।

पीतल की जलाधारी पर उत्कीर्ण नाग करीब ढाई फीट गोलाकार लिंग व्यास को आवेष्ठित किये है, शिवलिंग पर करीब 10 इंच चौड़ा नाग फण छाया किये है जो विशेष दर्शनीय है। भव्य लिंग दर्शनीय है। छोटे गर्भगृह में सामने के ताख में गणेश व पार्वती की प्रतिमाएं स्थापित हैं, बाह्य फर्श पर 1 इंच आसंदी पर प्राचीन श्याम वर्ण नंदी विराजित हैं। पूरा मंदिर कुल 7 फीट ऊंचा है, यहां अन्य 84 मंदिरों की तरह न मंदिर की चार दीवारी है, शिखर भाग तो है ही नहीं।

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लिंग माहात्म्य की कथा-

पूर्व वाले ब्राह्यकल्प में जब राजा रिपुञ्जय महाकालवन में श्रेष्ठ प्रजापालक के रूप में प्रसिद्ध थे तब महादेव का मन भी उज्जयिनी के बिना कहीं नहीं लगता था। उस समय शिव की आज्ञा से शिव का एक गण महाकालवन में भिक्षुक बनकर पहुंचा तथा दुन्दुभि बजाकर कहने लगा कि मैं सभी युक्तिसंपन्न वैद्य हूं।

मैं सभी को उसका अभिष्ट दे सकता हूं। वह गण वहां चौदह वर्ष रहकर राजा को दोष ढूंढता रहा, पर उसने राजा को अत्यंत प्रजापरायण पाया। राजा रिपुञ्जय की एक प्राणप्रिय पत्नी बहुला ने पुत्रेष्ठा के वश उस भिक्षु को अन्त:पुर बुलवाया, पर उसने बिना राजा के बुलाए आने से मना कर दिया। तब एक बार राजा से रानी ने अपने क्लानमुख का कारण पुत्रहीनता बताया।

इस पर दोनों ही उस भिक्षु के पास गये। राजा को देखते ही वह लिंगरूपी हो गया। राजा को पुत्र का आशीर्वाद मिला जो धार्मिक, यशवान, सार्वभौम था। महादेव ने पार्वती से कहा कि तब मैं कौतुकवश महाकालवन आया तथा यहां अपनी पुरी का निर्माण कर लिया।

फलश्रुति-

शिवेश्वर पुत्रप्रद लिंग है, इसकी अर्चना से गाणपत्य पद प्राप्त होता है। इसकी कथा सुनने से पापों से मुक्तिलाभ मिलता है।

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