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38/84 महादेव : श्री कुसुमेश्वर महादेव मंदिर

वरोदत्तो बहुमतो दुष्प्राप्यस्त्रिदशैरपि
न तेषां जायते पापं पद्मपत्रेयथाजलम्।।

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लेखक – रमेश दीक्षित

(अर्थात, (महादेव कहते हैं) इसे मैंने अनेक देव दुर्लभ वर दिये हैं। इस लिंग का दर्शन करने वाले के शरीर में पाप वैसे ही नहीं रह सकेगा, जैसे कमल के पत्ते पर जल नहीं ठहरता।

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शिवेश्वर लिंग के करीब 30 फीट उत्तर में भारी पत्थरों के स्तम्भों के जराजर्जरित ढांचे में यह दिव्य कुसुमेश्वर लिंग अवस्थित है। इसका पूर्वामुखी साढ़े छ: फीट ऊंचा अति प्राचीन पत्थरों के द्वार के भीतर लोहे का द्वार है। करीब 25 वर्गफीट के गर्भगृह में जो पत्थर का आड़ा बीम है वह जर्जर है तथा वहां छत सहित पानी टपक रहा है।

पीतल की जलाधारी के मध्य करीब 5 इंच ऊंचे शिवलिंग पर तांबे का नाग छाया किये हुए है। समीप ही त्रिशूल गड़ा है। सामने प्राचीन दीवार पर अद्भुत मूर्ति है। जिसमें शिव की गोद में देवी पार्वती विराजित हैं जो तांत्रिक स्वरूप है शिव-शक्ति का। मूर्ति का दायें ऊपर की ओर कार्तिक स्वामी व नीचे गणेश की तथा बाईं ओर ऊपर वीरभद्र व नीचे कुबेर की मृर्तियां दिखाई पड़ रही हैं। प्रवेश द्वारा के बायें लोहे की जाली लगी है।

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लिंग माहात्म्य की कथा-

एक बार वैवस्वत कल्प में महादेव पार्वती के साथ महाकालवन में रमण कर रहे थे, तब उनकी जपमाला से घोर शब्द उठा। पार्वती के पूछने पर शिव ने कहा कि यहां गणपितगण, क्रीड़ा कर रहे हैं उनमें मेरा एक प्रिय गण वीरक पुष्पों द्वारा आहत और पूजित हो रहा है।

पार्वती ने महादेव से ऐसे ही पुत्र की कामना की। तब शिव ने उसे गणानन्ददायक वीरक को पुत्र रूप में प्रदान कर दिया। उसे पाकर पार्वती आह्लादित हो गई तथा उसे भूषित किया। तुमने कुसुमेश्वर नाम से उसकी प्रसिद्धि की भी महादेव से प्रार्थना की। महादेव ने कहा वीरक हमारा प्रिय पात्र है, जनगण इसे हमारे समान देखेंगे, सुनो गंधर्वों और किन्नरी का गायन। अप्सरायें भी वीरक को घेरकर नृत्य कर रही हैं। इस प्रकार महादेव ने वीरक को कुसुमेश्वरत्व प्रदान किया तथा अनेक देवदुर्लभ वर भी प्रदान किये हैं।

फलश्रुति-

महादेव ने कहा जो कुसुमेश्वर की पुष्प से पूजा करेंगे वे मेरा लोक प्राप्त करेंगे। जो भक्तिपूर्वक इस लिंग की पूजा करेंगे, वे परम पद पाएंगे तथा उनका पुनर्जन्म नहीं होगा।

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