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41/84 महादेव : श्री लुम्पेश्वर महादेव मंदिर

लुम्पेश्वरं सकृत्पश्चन्मुच्यतेसर्वकिल्विष:।
पूजितो ऽ पिदहेत्पापंसप्र जन्मार्जितंचयत।।

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लेखक – रमेश दीक्षित

(अर्थात- लुम्पेश्वरं लिंग का दर्शन करने वाले कि सभ कामनाओं की पूर्ति होती है तथा उसके सात जन्मों के संचित पाप भी नष्ट होंगे।)

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पुराने पत्थरों की चौखट के भीतर साढ़े पांच फीट ऊंचे लोहे की भीतरी वाले पूर्वाभिमुख प्रवेश द्वार से गर्भगृह में प्रवेश करने पर करीब 3 फीट चौड़ी पीतल की जलाधारी के मध्य 1 फीट ऊंचा शिवलिंग प्रतिष्ठित है जिसके ऊपर तांबे के नाग छाया किये हुए हैं।

3 फीट ऊंचा पीतल के त्रिशूल पर डमरू लगा है। सम्मुख गणेश, पार्वती व कार्तिक स्वामि की मूर्तियां है तथा 2 शंख व सूर्य-चंद्र की आकृतियां मंडित हैं। फ्लोर व दीवारों पर 2 फीट तक संगमरमर लगा है, ऊपर की शेष दीवारें प्राचीनता का साक्ष्य देती हुई प्राचीन काले प्रस्तर की बनी हैं।

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लिंग की माहात्म्य कथा-

देवी पार्वती को लुम्पेश्वर लिंग की कथा कहते हुए महादेव कहते हैं- एक बार लुम्पपाधिप नामक राजा एक ब्राह्मण के कहने पर युद्ध के लिए सामग मुनि के आश्रम जा पहुंचा। राजा ने मुनि की होमधेनु गाय का बलात हरण कर लिया तथा आपत्ति करने पर मुनि का वध कर दिया। जब मुनि का पुत्र आश्रम में लौटा तो उसने पहले मृत पिता का अंतिम संस्कार सविधि संपन्न किया तथा लुम्पक को कुष्ठ रोगी होने का शाप दे दिया।

जब कुष्ठ की ००० यातना से वह ०० हो गया तब वह स्वयं की चिता बना रहा था तभी वहां देवर्षि नारद जी पहुंचे। नारद से उपाय पूछने पर उन्होंने उसे महाकालवन भेजकर एक लिंग विशेष की आराधना करने का कहा जिससे वह पुन: कान्ति प्राप्त करेगा। उस लिंग दर्शन से लुम्पक कुष्ठ रोग से मुक्त हुआ, तब से यह लिंग लुम्पेश्वर नाम से प्रसिद्ध हुआ।

फलश्रुति-

महापापयुक्त व्यक्ति भी इसके दर्शन से देवतुल्य हो जाता है। गौ हत्यारा, मातृपाती, गुरुपत्नी गामी, दुष्कर्मी, भातृहन्ता एक बार के दर्शन से ही दुष्कृत जनित पापों से मुक्त हो जाता है।

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