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69/84 महादेव : श्री सङ्गमेश्वर महादेव मंदिर

य: पश्चेत्परयाभक्तयातििल्लङ्गसङ्गमेश्वरम्।
नवियोगोभवेत्तस्यपुत्रभ्रातृप्रियादिभि:।।५६।।

(अर्थात- जो परम भक्ति युक्त होकर संगमेश्वर लिंग की पूजा करता है उसको कभी पुत्र, भाई, पत्नी आदि का वियोग दु:ख नहीं होता।)

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यह प्राचीन सुरम्य मंदिर जयराम शनिराम की बगीची में शिप्रा नदी (रामघाट) के दक्षिणी भाग में लक्ष्मण सीढ़ी चढऩे पर स्थित है। इसका प्रवेश द्वार 5 फीट ऊंचा पुराने प्रस्तर स्तम्भों से निर्मित होकर पूर्वाभमुखी है। भीतर स्टील द्वार है। गर्भगृह में प्रवेश करने पर फर्श व नीचे आधी दीवार संगमरमर से जुड़ी हुई दिखाई देती है।

गर्भगृह में जाने पर दाएं ताक में पार्वती, व गणेश की, सम्मुख्चा श्यामवर्ण पाषाण की पार्वती की प्राचीन मूर्ति तथा बाएं ताक में भगवान विष्णु की पाषाण वे शालग्राम की मूर्ति स्थापित है। साढ़े तीन फीट चौड़ी जलाधारी पर नाग आवेष्ठित किये है। 7 इंच ऊचे श्यामवर्ण लिंग को तथा जलाधारी पर 2 शंख व सूर्य-चंद्र उत्कीर्ण है। त्रिशूल व डमरू भी है। दक्षिणाभिमुखी निर्गम द्वार के सम्मुख करीब ढाई फीट लंबे काले पाषाण के वृहदाकार-वाहन नंदी दर्शनीय है। मंदिर की प्राचीनता परिवेश से स्वयं सिद्ध है।

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लिंग का माहात्म्य की कथा-

महादेव ने पार्वती को कथा सुनाते हुए बताया कि कलिंग देश में, धर्मात्मा राजा सुबाहु अपनी पत्नी विशालाश्री के साथ प्रेम से रहता था, किंतु वह शिर पीडा से बहु दु:खी रहता था। रानी इस कारण बहुत दु:खित रहती थी तथा बार-बार इस पीड़ा का कारण जानना चाहती थी। अन्तत: राजा ने रानी से कहा कि मैं इसका कारण महाकालवन जाकर ही बताऊंगा जहां हम कल ही जाएंगे। वे शिप्रा तट पर रुके जहां त्रिपथगागंगा पातालवाहिनी हो गयी थी तथा शिप्रा व नीलगंगा के संगम स्थल पर संगमेश्वर महादेव स्थित है।

राजा ने विशालाश्री से कहा कि रोग का कारण मैं तुम्हें कल सुबह बताऊंगा।अगली सुबह राजा ने कहा कि पूर्व जन्म में हम दोनों वेद-ब्राह्मण निंदक, दुष्ट व पापी थे। कुछ समय बाद हुई अनावृष्टि से हम सब बिछुड़ गये। धर्मावलम्बन उचित समझते-समझते मैंने त्याग दिये तथा करोड़ों नरकों में यातना भोगी

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। अन्तत: मुझे शुभ्र शिप्रा जल में मतस्य योनि मिली। केवटों द्वारा हम दोनों का वध कर दिया गया। मैंने वहां शिप्रा, नीलगंगा तथा गंगा द्वारा संगमेश्वर लिंग को जलप्लावित होते देखा। यह देखते ही मैं कलिंग देश में जन्मा। उस दिन लिंग दर्शन से हम दोनों को राजत्व मिला।

मुझे याद है मध्यान्ह में तुमने मेरा शिर विद्ध तथा केवटों ने मुझ पर लाठी प्रहार किया था, इसी से मुझे मध्यान्ह में यह पीड़ा होती है। रानी ने राजा से कहा कि यह राजत्व, मनुष्य योनि तथा निर्मल कुल हमें इस संगमेश्वर लिंग के कारण ही मिले हैं। तदनन्तर राजा और रानी महाकालवन में संसार धर्म का आचरण करते रमण करने लगा विपुल योग करने के पश्चात वे संगमेश्वर लिंग में लीन हो गये।

फलश्रुति-

जो नियमित रूप से संगमेश्वर लिंग की पूजा करते हैं व राजसूय यज्ञ से अधिक फल लाभ करते हैं। इस लिंग का दर्शन करने से अनवरत संगल लाभ होता है। इसके दर्शन से मनुष्य को गंगा, यमुना, नर्मदा तथा चन्द्रभागा नदी में स्नान का फल मिलता है।

लेखक – रमेश दीक्षित

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