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उज्जैन में ऑक्सीजन की क्राइसेस के बीच भाव में तीन गुना उछाल…!

200 वाला सिलेंडर 700 रुपए में

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उज्जैन।शहर में इस समय दो ही समस्या मुख्य है- पहली आयसीयू में बेड और दूसरी ऑक्सीजन वाला बेड। इन दोनों की कमी के कारण मरीज जीवन और मौत के बीच झूल रहे हैं। इधर प्रायवेट हॉस्पिटल में उपचार करवा रहे लोगों का आरोप है कि पहले आयसीयू का बिल ज्यादा लगता था, अब ऑक्सीजन का बिल ज्यादा लग रहा है। जब डिस्चार्ज होते समय बिल हाथ में आता है तो उस पर लिखा होता है- ऑक्सीजन के चार्जेस 70 हजार रुपए। 10 दिन का यह बिल संकेत करता है कि मरीज को कम से कम 7 हजार रुपए रोज की ऑक्सीजन लगी।

मरीजों के परिजनों का आरोप है कि जब हम पूछते हैं कि ऑक्सीजन इतनी अधिक महंगी क्यों लगाई? तब जवाब आता है कि पहले जो ऑक्सीजन सिलेण्डर 200 रू. में 7.5 किग्रावाला रिफिल होता था अब वह आ रहा है 700 रू. में। इसमें भी ट्रांसपोर्ट और लेबर हॉस्पिटल वालों को देना पड़ रहा है। यह जवाब सुनकर मरीज के परिजनों चौंक जाते है। वे प्रश्न कर रहे हैं कि यदि क्राइसेस के बीच जीवनदायिनी औषधि बनी ऑक्सीजन के भाव में ढाई गुना अधिक उछाल है तो फिर सरकार क्या कर रही है? साधारण परिवार तो अपने परिजन का उपचार इस समय प्रायवेट हॉस्पिटल में करवा ही नहीं सकते हैं?

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ये अंदर की बात…पहले वह हाथ जोड़ता था, अब ये जोड़ रहे

कुछ हॉस्पिटल संचालकों से चर्चा की गई तो उनका जवाब था: दो माह पूर्व तक ऑक्सीजन सप्लायर हमे 200 रू. में विथ ट्रांसपोर्ट और लेबर के साथ ख़ुशी ख़ुशी 7.5 किग्रा वाला सिलेण्डर प्रदाय करता था। क्राइसिस शुरू होने के बाद वही ठेकेदार अब हमारे हाथ जोडऩे पर भी डिमांड से आधे सिलेण्डर 200 रू. की बजाय 700 रू. में देता है। उसके उपर वह ट्रांसपोर्ट और लेबर के रूपये लेता है, सरकार का ध्यान इस ओर नहीं जा रहा है। चूंकि हमे अधिक भाव में मिल रहा है, इसलिए हमे मरीज से अधिक राशि लेना पड़ रही है। यह बात मरीज समझने को तैयार नहीं है और विवादों की जड़ यही बात आनेवाले दिनों में बनती चली जाएगी। ऐसा न हो कि कोई बड़ा हंगामा हो जाए तथा प्रायवेट हॉस्पिटल संचालक अपने हॉस्पिटल बंद करके घर बैठ जाएं?

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यह कारण है डिमांड अधिक बढऩे का
डॉ.एच पी सोनानिया के अनुसार पिछले एक माह से कोरोना का म्यूटेंट बदला है। मरीजों का एसिम्प्टोमेटिक होने पर भी ऑक्सीजन का स्तर कम होने लगता है। कोरोना होने पर ऑक्सीजन मिलेगी या नहीं? यह खौफ भी लोगों में मन में समा गया है। यही कारण है कि साधारण व्यक्ति भी डिप्रेशन में आ जाता है और उसकी ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाता है। अधिकांश मामलों में ऑक्सीजन अनिवार्यता बन गई है। डिमांड बढऩे के साथ सप्लाय उस अनुरूप नहीं है। इसलिए डिमांड बढ़ती जा रही है। जबकि पूर्व की अपेक्षा सप्लाय भी बढ़ी है।

हम कानून व्यवस्था देख रहे
इस संबंध में ऑक्सीजन को लेकर व्यवस्था देख रहे नोडल अधिकारी क्षितिज सिंघल से चर्चा की गई तो उन्होने कहाकि हम तो कानून व्यवस्था देख रहे हैं ताकि ऑक्सीजन की सप्लाय ठीक हो सके और हर मरीज के पास ऑक्सीजन की उपलब्धता हो। भावों को लेकर तो ठेकेदार ही बता सकता है। इस संबंध में तपोभूमि पर ऑक्सीजन का काम देख रहे ठेकेदार प्रदीप तथा सोनी से बात करने की कोशिश की गई ताकि भावों का यह अंतर स्पष्ट हो सके। लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका।

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