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70/84 महादेव : श्री दुद्र्धर्षेश्वर महादेव मंदिर

दर्शनात्स्पर्शनात्सद्यो नामसङ्कीत्र्तनादपि।
ब्रह्महत्यासहस्र हि तत्क्षणादेव नश्यति।।

(अर्थात्- इस लिंग के दर्शन, स्पर्श, नाम संकीर्तन से तत्क्षण सहस्र ब्रह्महत्या भी निवृत्त हो जाती है।)

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शिप्रा नदी की बडऩगर मार्ग को जोडऩे वाली रपट को रामघाट से जोडऩे वाले मार्ग पर गंधर्व घाट के पूर्व में करीब 7 फीट ऊंचे बड़े प्लेटफार्म पर 84 में से तीन महादेव मंदिर स्थित हैं। 1. कुक्कुटेश्वर महादेव 2. कामेश्वर महादेव और 3. दुद्र्धर्षेश्वर महादेव जो क्रमांक 1 के दक्षिण में पास-पास स्थित हैं। मंदिर के पश्चिमाभिमुखी 5 फीट ऊंचा पाषण निर्मित द्वार के भीतर एक और स्टील गेट है।

करीब 2 फीट चौड़ी उत्तराभिमुखी पीतल की जलाधारी केबीच श्याम वर्ण प्रस्तर का करीब 7 इंच ऊंचा शिवलिंग प्रतिष्ठित है। जिसे नाग आवेष्ठित किए हैं। 2 शंख तथा सूर्य-चंद्र की आकृतियां उत्कीर्ण हैं। जलाधारी से 1 फीट दूर ही नंदी की प्रतिमा तथा गर्भगृह में बायें से देवी पार्वती, सम्मुख कार्तिकेय व दायें गणेशजी की मूर्तियां स्थापित हैं।

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लिंग माहात्म्य की कथा-

नेपाल का यशस्वी राजा दुद्र्धुर्ष एक वन मेें दर्पणवत् सुंदर सरोवर के पास एक वनदेवी स्वरूपा कन्या को देखकर चित्रलिखित सा स्तब्ध रह गया, वहीं वह कन्या भी उसके प्रति पूर्णत: आमृष्ट हो गई। उसने राजा को उसका हाथ मांगने हेतु अपने तपस्वी पिता कल्प के पास भेजा।

कामपीडि़त राजा तुरंत मुनि के पास गया, उसने कन्या राजा को सौंप दी। राजा कामदेव के वशीभूत वहीं वन में उस कन्या के साथ रमण करने लगे। वे राज्य लौटना भी भूल गए। इसी बीच एक विकटाकार दैत्य ने उस कन्या का हरण कर लिया, राजा उस कन्या के लिए विलाप करता रह गया। राजा की यह दशा देख मुनि सत्तम कल्प उसके पास और कहा कि तुम्हारा नेपाल राज्य, तीन रानियां व मेरी पुत्री कहां गए। हे नृप! जीवन अनित्यहै, राज्य जल का बुलबुला है। अत: तुम महाकाल वन में विशेष्ज्ञ लिंग का दर्शन करो। राजा ने ऐसा ही किया।

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वहां उसे मुनि पुत्री दिख पड़ी। उस लिंग से वाणी उद्भूत हुई, उसने कहा यह सिद्धिपति विश्वावसु की प्रिय पुत्री है, इसे ग्रहण कर निष्कंटक राज्य भोगो। यह लिंग राजा के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

फलश्रुति-

इस लिंग का दर्शन करने वाले शत्रुओं के लिए दुद्र्धर्ष हो जाएंगे। पानी व दुष्कर्मी भी सद्य: मुक्तिलाभ करेंगे। इसके दर्शन, स्पर्श, नाम संकीर्तन से ब्रह्महत्या की भी निवृत्ति हो जाती है। यहां प्रदत्त दान असंख्य फलदायक होता है।

लेखक – रमेश दीक्षित

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