कलेक्टर की सादगी बहुत कुछ कह रही है…

वीआईपी कल्चर का बढ़ता शौक समाज में तेजी से पनप रहा है। बड़े पदों पर बैठे अधिकारी का तो कहना ही क्या? वे हर काम वीआईपी तरीके से करते हैं, किंतु उज्जैन कलेक्टर नीरज कुमार सिंह ने वीआईपी कल्चर को तोड़कर सादगी से काम करने का एक उदाहरण प्रस्तुत किया है और संदेश भी दिया है कि बगैर वीआईपी कल्चर के भी जिंदगी जीने का एक अलग ही अनुभव होता है और इससे लोगों के मन में वीआईपी या अधिकारी के प्रति सम्मान बढ़ता ही है।
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कलेक्टर नीरज कुमार सिंह प्रतिदिन सुबह महाकाल दर्शन करने जाते हैं और वह भी बिना किसी रुतबे के। बुधवार प्रात: वे पुलिस कंट्रोल रूम के पास हाल ही शुरू हुए इंडियन कैफे हाउस में चाय नाश्ता करने पहुंचे। उन्होंने कैफे में इतनी सादगी से कॉफी के साथ नाश्ता किया कि कैफे वालों को भी यह पता नहीं चला कि कलेक्टर आए और डोसा खाकर कब कॉफी पीकर निकल गए। न किसी ने फोटो लिया न कोई सोशल मीडिया पर इसका जिक्र हुआ।
ऐसा कम ही देखने को मिलता है। प्राय: बड़ा अधिकारी पहले अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के माध्यम से सूचना करवाता है फिर वहां जाता है। दमोह में भी कलेक्टर साइकिल चलाते हुए अस्पताल का निरीक्षण करने पहुंच गए थे। कलेक्टर की ये सादगी बहुत कुछ कहती प्रतीत होती है।
बड़े पद का गुरुर न कर केवल काम पर फोकस करने के अच्छे और सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं। कहते हैं कलेक्टर ने साइकिल चलाना इसलिए छोड़ दिया ताकि वे खबरों की सुर्खी न बनें और अपने काम पर फोकस कर सकें। प्रचार प्रसार और रुतबे से वे दूर रहना ही पसंद करते हैं।
दूसरी तरफ महाकाल मंदिर में दर्शन करने के लिए भी लोग वीआईपी कल्चर को नहीं छोड़ पाते। वीआईपी दर्शन के साथ मुफ्त में लड्डू प्रसादी और उत्तरीय वस्त्र से सम्मान किए जाने की अपेक्षा रखी जाती है। मंदिर प्रबंध समिति को भी विवश होकर हर साल लाखों रुपए का लड्डू प्रसाद मुफ्त में ही भेंट करना पड़ता है।
अगर मुफ्त के प्रसाद पर होने वाले खर्च का आंकड़ा देखा जाए तो चौंका सकते हैं। बहरहाल, कलेक्टर की सादगी इस बात के लिए सबक है कि अपने कर्तव्य का पालन महत्वपूर्ण है न कि वीआईपी रुतबा।