स्कूलों में ऑनलाइन गेमिंग के खतरे बताएं, अभिभावक की भी जिम्मेदारी

इंदौर के अकलंक की मौत से शहर के अभिभावक भी सहमे
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अक्षरविश्व न्यूज उज्जैन। इंदौर में सातवीं कक्षा के नन्हे छात्र अकलंक जैन की आत्महत्या से शहर के लोग खासकर बच्चों के अभिभावक सहम उठे हैं और चिंतित हो उठे हैं कि ऑनलाइन गेमिंग से बच्चों को कैसे दूर रखा जाए? अभिभावक यह अपेक्षा भी रख रहे कि निजी स्कूलों में भी इसके लिए विद्यार्थियों को ऑनलाइन गेमिंग के खतरे बताए जाएं, क्योंकि शिक्षकों की बातों का स्टूडेंट पर असर ज्यादा होता है।
उज्जैन में भी कई परिवार ऐसे हैं, जिनके बच्चे मोबाइल का उपयोग ज्यादा करते हैं। बच्चों को खुश करने के लिए उन्हें अलग मोबाइल भी दिलाए गए हैं। शुक्रवार को इंदौर के अनुराग नगर में अंकेश जैन के पुत्र अकलंक के साथ हुई घटना ने शहरवासियों को स्तब्ध कर दिया है। जिन परिवारों में बच्चे मोबाइल उपयोग करते हैं, वहां चिंता बढ़ गई है। बच्चे और युवा आजकल ऑनलाइन गेमिंग की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे। टीवी पर क्रिकेट मैच के दौरान ऑनलाइन गेम के विज्ञापन भी बच्चों को इसके लिए प्रोत्साहित करते हैं।
एक्सपर्ट्स ने बताए टिप्स
बच्चों को अगर स्मार्टफोन दें तो उसमें एज रेटिंग सेट कर सकते हैं।
बच्चों पर नजऱ रखें कि वह अकेले में मोबाइल का उपयोग तो नहीं कर रहा।
टीवी पर जब ऑनलाइन गेमिंग के विज्ञापन आएं तो स्विच ऑफ करें।
बच्चों को इसके खतरे बताएं और उन्हें समझाने का प्रयास करें।
मुद्दा डर, अकेलापन है
यह घटना एक चेतावनी है। बच्चे मोबाइल में नहीं, हमारे साथ सुरक्षित महसूस करें, यही ज़रूरी है। आज बच्चे मोबाइल और ऑनलाइन दुनिया में इतना उलझ जाते हैं कि माता-पिता को पता भी नहीं चलता कि वे क्या देख रहे हैं, क्या सीख रहे हैं और किस दबाव में हैं। बच्चों को ये भरोसा देना ज़रूरी है कि कोई भी गलती उनकी जिंदगी से बड़ी नहीं है। तीन बातें हर पैरेंट याद रखें। पहली बच्चों को डर नहीं, भरोसा दें। दूसरी गेमिंग और ऑनलाइन आदतों पर खुलकर बात करें। भावनात्मक जुड़ाव रोज़ाना बनाए रखें।
हर्षिता धनवानी
लाइफ एंड पेरेंटिंग कोच
स्कूल से ज्यादा घरों में केयर करें
इंदौर की घटना भयावह है। मैं जब भी क्लास में किसी बच्चे के पास मोबाइल देखती हूं तो उसे टोकती हूं। स्कूलों में बच्चों को ऑनलाइन गेमिंग के खतरे बताए जाएं, लेकिन घरों में केयर करने की जरूरत ज्यादा है। सोचने वाली बात ये भी है कि अकलंक ने मोबाइल उसकी मम्मी के बैंक खाते से कनेक्ट कर लिया था।
डॉ. चित्रा जैन, प्राचार्य आदर्श संस्कृत उमावि, मोहननगर
पूरे समाज को लडऩा होगा
इस मामले से सबसे बड़ी सीख तो ये लेनी चाहिए कि इतने छोटे बच्चों के पास फोन नहीं हो। अगर अभिभावक दे भी रहे हैं तो नजर रखें कि बच्चा क्या देख रहा है। बच्चों को ऐसे गेम्स और वीडियो साइट्स से दूर रखें। ये ऑनलाइन गेम्स और साइट्स नए जमाने की बीमारियां हैं, जिससे पूरे समाज को लडऩा होगा।
डॉ. सिद्धार्थ सिंह राठौड़, मनोचिकित्सक
मनोवैज्ञानिक चेतावनी
यह घटना केवल पारिवारिक त्रासदी नहीं, बल्कि समाज के लिए एक गंभीर मनोवैज्ञानिक चेतावनी है। आज के बच्चे बाहरी दुनिया से सिर्फ मोबाइल के जरिए तो जुड़े हैं, मगर अंदर से अकेले हैं। ऑनलाइन गेमिंग की लत इंस्टेंट ग्रेटीफिकेशन अर्थात संतुष्टि देती है। यह ना मिल पाने पर बच्चों में इंप्लसिव व्यवहार और निराशा को जन्म देते हैं। इस उम्र में दिमाग पूरी तरह विकसित नहीं होता। निर्णय लेने की क्षमता कमजोर होती है, और भावनाएं चरम पर होती हैं। हर दिन बच्चों से खुलकर बात करें।
डॉ. खालिद पटेल खान, मनोचिकित्सक (उज्जैन और इंदौर में देते हैं सेवाएं)