Inspector Avinash 2 Review: रणदीप हुड्डा ने जमाया रंग, लेकिन कहानी में दिखीं कुछ कमजोर कड़ियां
Inspector Avinash Season 2 Review: रणदीप हुड्डा की दमदार एक्टिंग के बावजूद जानिए कहानी और स्क्रीनप्ले में कहां कमजोर पड़ गई सीरीज।

‘इंस्पेक्टर अविनाश सीजन 2’ का कंप्लीट रिव्यू
पुलिस की बहादुरी और उनके कड़क कारनामों पर वैसे तो कई फिल्में और Web Series बनती रहती हैं। इसी लिस्ट में एक नाम ‘इंस्पेक्टर अविनाश’ का भी है। इस सीरीज का सीजन 2 वहीं से आगे बढ़ता है जहाँ पहला पार्ट खत्म हुआ था। इसमें पावर, धोखा, पॉलिटिक्स और सस्पेंस का वो सारा मसाला है, जो एक परफेक्ट Action-Crime सीरीज के लिए जरूरी होता है। इस रिव्यू में हम आपको बताएंगे कि एक धमाकेदार शुरुआत करने के बाद यह शो कहाँ थोड़ा स्लो हो जाता है, और आपको इसे क्यों देखना चाहिए।
क्या है इसकी कहानी?
जब भी कोई Crime-Thriller अपने पहले सीजन में सुपरहिट हो जाती है, तो उसके अगले पार्ट से लोगों की उम्मीदें बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं। यह सीरीज उन उम्मीदों पर पूरी तरह खरी उतरी है। यूपी पुलिस के तेज-तर्रार अफसर अविनाश मिश्रा की लाइफ हर एक एपिसोड के साथ नया रोमांच लेकर आती है। स्क्रीन पर एक साथ कई केस चलते हैं, फिर भी आप उनके बीच का कनेक्शन मिस नहीं करते। इसकी स्क्रिप्टिंग इतनी रीयलिस्टिक है कि आपको कुछ भी बनावटी या नकली नहीं लगता।
कहानी पिछले सीजन के आगे का ट्रैक पकड़ती है। पिछली बार जहाँ सिर्फ राजनीतिक दखलंदाजी की एक झलक मिली थी, इस बार उसे गहराई से एक्सप्लेन किया गया है। यूपी STF के अफसर अविनाश मिश्रा का लखनऊ से शुरू हुआ क्राइम-क्लीनिंग का मिशन इस बार चंबल के बीहड़ों और बागियों तक पहुँच जाता है।
अविनाश अपनी जांबाज टीम के साथ इस क्राइम नेटवर्क को तोड़ तो देते हैं, लेकिन असली ट्विस्ट कुछ और ही है। दुश्मन सिर्फ बाहर नहीं हैं, बल्कि उनके खुद के डिपार्टमेंट के अंदर भी कई गद्दार बैठे हैं। अब अपनी ही टीम में छिपे उस विलेन को वो कैसे ढूंढेंगे और पीड़ितों को इंसाफ कैसे दिलाएंगे? यही जानने के लिए आपको यह सीरीज देखनी होगी।
कैसी है कलाकारों की एक्टिंग?
इस सीरीज की कास्टिंग बहुत ही परफेक्ट है। हर एक एक्टर को उसकी काबिलियत के हिसाब से रोल दिया गया है। स्क्रीन टाइम चाहे कम हो या ज्यादा, सभी कलाकारों ने अपने किरदारों में जान फूंक दी है। अविनाश मिश्रा के लीड रोल में रणदीप हुड्डा एक बार फिर उसी स्वैग और कड़क अंदाज में नजर आए हैं, जिसके लिए वो पॉपुलर हैं। उनके बोलने के स्टाइल से लेकर एक्शन सीन्स तक में एक रियल सुपर-कॉप वाली वाइब आती है।
उर्वशी रौतेला का रोल शुरू में थोड़ा स्लो लग सकता है, लेकिन वो कहानी की डिमांड थी। दूसरी तरफ, अमित सियाल ने अपने निगेटिव रोल को बहुत ही शानदार तरीके से निभाया है, वो काफी दमदार लगे हैं।
कहानी के दूसरे विलेन के रूप में अभिमन्यु सिंह के पास डायलॉग्स भले ही कम थे, लेकिन उन्होंने अपने फेस एक्सप्रेशंस से तगड़ा इंप्रेशन छोड़ा है। इसके अलावा रजनीश दुग्गल, शालीन भानोट, जाकिर हुसैन और फ्रैडी दारूवाला जैसे बाकी सपोर्टिंग एक्टर्स ने भी अपने छोटे-छोटे रोल्स के साथ पूरा इंसाफ किया है।
डायरेक्शन और कमियाँ
डायरेक्टर नीरज पाठक ने सीरीज की शुरुआत तो बहुत ही बेहतरीन की है। शुरुआती छह एपिसोड्स में किरदारों और कहानी दोनों को बहुत अच्छे से सेट किया गया है, जिसे देखने में मजा आता है। लेकिन सातवें एपिसोड के बाद कहानी अचानक बहुत तेजी से भागने लगती है और रणदीप हुड्डा की एक्टिंग भी थोड़ी ढीली लगने लगती है।
आखिरी के कुछ एपिसोड्स में वो थोड़े थके हुए से दिखते हैं। जिन प्रॉब्लम्स को शुरुआत में बहुत बड़ा और सीरियस दिखाया गया था, एंड में उन्हें बहुत ही आसानी से निपटा दिया गया। अगर इसके क्लाइमेक्स पर थोड़ा और काम किया जाता, तो यह एक मास्टरपीस सीरीज बन सकती थी।
फाइनल वर्ड: देखें या छोड़ दें?
इस सीरीज में टोटल दस एपिसोड्स हैं। अगर आप मारधाड़, सस्पेंस और अंडरवर्ल्ड से जुड़ी कहानियों को देखने के शौकीन हैं, तो आपको इसे बिल्कुल भी मिस नहीं करना चाहिए। हाँ, लेंथ के मामले में यह थोड़ी लंबी जरूर है, लेकिन यह आपको कहीं भी बोर नहीं करेगी। इसके शुरुआती एपिसोड्स आपको स्क्रीन से बांध कर रखने का दम रखते हैं









