कादर खान Birthday Anniversary: जानिए फकीरी से सुपरस्टार बनने का सफर

कादर खान Birthday Anniversary के खास मौके पर आज हम हिंदी सिनेमा के उस महान कलाकार और लेखक को याद कर रहे हैं, जिनकी कलम और अदाकारी ने दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज किया। “हम जहां खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है…” जैसे सुपरहिट डायलॉग देने वाले कादर खान की निजी जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम संघर्ष भरी नहीं थी। काबुल की वादियों से लेकर मुंबई की तंग गलियों और फिर सिल्वर स्क्रीन तक का उनका सफर बेहद प्रेरणादायक रहा है। आइए जानते हैं कादर खान के जीवन से जुड़े कुछ अनसुने और दिलचस्प किस्से।
कमाठीपुरा की तंग गलियों और भुखमरी से शुरुआत
22 अक्टूबर 1937 को अफगानिस्तान के काबुल में जन्मे कादर खान का शुरुआती जीवन बहुत कठिनाइयों में बीता। उनके तीन बड़े भाइयों की बचपन में ही मौत हो जाने के कारण उनकी मां डर गई थीं, जिसके बाद उनका परिवार बॉम्बे (मुंबई) आ गया। यहाँ आकर उन्हें बॉम्बे की सबसे बदनाम और गरीब बस्ती कमाठीपुरा में रहना पड़ा। जब कादर खान महज दो साल के थे, तब उनके पिता उन्हें छोड़कर पास की ही एक मस्जिद के इमाम बन गए। घर में खाने के लाले पड़े थे, जिसके कारण छोटे से कादर को कई बार पेट भरने के लिए मस्जिदों के बाहर भीख तक मांगनी पड़ी थी।

कब्रिस्तान में डायलॉग बोलने से बदला जीवन का रुख
कादर खान को बचपन से ही लोगों की नकल उतारने का शौक था। जब मां उन्हें मस्जिद भेजतीं, तो वे बस्ती से दूर कब्रिस्तान में जाकर कब्रों के बीच खड़े होकर जोर-जोर से फिल्मी डायलॉग और आवाजें निकालते थे। एक दिन उनकी आवाज थिएटर से जुड़े अशरफ खान ने सुन ली और उन्हें नाटक में काम करने का ऑफर दे दिया। यहीं से उनके रंगमंच का सफर शुरू हुआ। अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और भायखला के कॉलेज में प्रोफेसर के रूप में पढ़ाने भी लगे।
सिर्फ 3 घंटे में लिखी थी पूरी फिल्म के डायलॉग
नाटकों में उनके अभिनय और लेखन की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई थी। प्रसिद्ध निर्देशक नरेंद्र बेदी ने जब उनका नाटक देखा, तो उन्होंने कादर खान को फिल्म ‘जवानी दीवानी’ के डायलॉग लिखने का ऑफर दिया। कादर खान मरीन ड्राइव की पटरी पर बैठे और महज 3 घंटे के भीतर पूरी फिल्म के दमदार डायलॉग लिख डाले। उनकी इस तेजी और प्रतिभा को देखकर निर्देशक दंग रह गए। इसके बाद उन्होंने ‘रोटी’, ‘अमर अकबर एन्थॉनी’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’ और ‘कूली’ जैसी लगभग 250 से अधिक फिल्मों के शानदार संवाद लिखे।

दिलीप कुमार के फोन से खुला फिल्मों का दरवाजा
एक बार मशहूर कॉमेडियन आगा ने कादर खान का नाटक देखकर दिलीप कुमार को उसके बारे में बताया। अगले ही दिन कॉलेज के स्टाफ रूम में फोन की घंटी बजी और दूसरी तरफ खुद लीजेंड्री एक्टर दिलीप कुमार थे। दिलीप कुमार ने उनका नाटक देखने की इच्छा जताई और बाद में उन्हें अपनी फिल्मों में काम करने का मौका दिया। राजेश खन्ना की फिल्म ‘दाग’ (1973) से बतौर अभिनेता अपने करियर की शुरुआत करने वाले कादर खान ने अपने अभिनय के दम पर करीब 300 फिल्मों में अपनी छाप छोड़ी।
‘सर जी’ न कहने पर क्यों आई अमिताभ बच्चन से दूरी?
अमिताभ बच्चन के साथ कादर खान की जोड़ी पर्दे पर और ऑफ-स्क्रीन दोनों जगह बहुत मजबूत थी। उन्होंने अमिताभ की कई सुपरहिट फिल्मों की स्क्रिप्ट और डायलॉग लिखे थे। लेकिन एक समय ऐसा आया जब दोनों के बीच दूरियां बढ़ गईं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक शूटिंग के दौरान दक्षिण भारत के एक प्रोड्यूसर ने कादर खान से कहा कि वे अमिताभ बच्चन को ‘सर जी’ कहें। कादर खान ने साफ कह दिया कि वह उनके लिए सिर्फ ‘अमित’ और उनके दोस्त हैं। जब यह बात अमिताभ तक पहुँची और उन्होंने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, तो दोनों दोस्तों के रास्ते अलग हो गए।

जीवनभर अपनी बेहतरीन कॉमेडी और संजीदा अभिनय से लोगों को हंसाने और रुलाने वाले कादर खान का निधन 31 दिसंबर 2018 को कनाडा में हुआ। भारतीय सिनेमा में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें मरणोपरांत वर्ष 2019 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उनका जीवन यह सिखाता है कि भीषण से भीषण गरीबी और संघर्ष के बाद भी अगर हौसला बुलंद हो, तो इंसान अपनी तकदीर खुद लिख सकता है।








