नरेंद्र सिंह अकेला|उज्जैन। देशभक्ति का पर्याय बन चुके भारत कुमार के नाम से मशहूर और सिने प्रेमियों के दिल में क्रांति की ज्वाला प्रज्ज्वलित करने वाले मनोज कुमार की एक तमन्ना अधूरी रह गई। वे बाबा महाकाल के दर्शन करना चाहते थे। उज्जैन के कई लोगों ने उनसे मुलाकात की। वे सभी से कहते रहे कि मुझे उज्जैन आना है। एक वक्त ऐसा भी आया कि सारी तैयारी हो चुकी थी। वे नहीं आ सके।
अपने जमाने के मशहूर गीतकार, झूठ बोले कव्वा काटे, काले कव्वे से डरियो, मैं मइके चली जाउंगी तुम देखते रहियो।
इस गीत के रचने वाले सागर के बीड़ी उद्योगपति वि_ल भाई पटेल से मनोज कुमार के नजदीकी संबंध रहे। फिल्म क्रांति (१९८१) के लिए उन्होंने वि_ल भाई को सिचुएशन दी थी और कहा था कि इस पर गीत लिख कर दीजिए। उन दिनों वे राजनीति के शिखर पर थे। समय नहीं मिला। बाद में मनोज कुमार ने अपने अन्य मित्र संतोष आनंद से कहा। उन्होंने गीत लिखा। गीत सुपरहिट साबित हुआ। संगीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने दिया था। गीत के बोल थे। जिंदगी की ना टूटे लड़ी, प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी।
विट्ठल और रघुवंशी
प्रख्यात फिल्म निर्माता निर्देशक रामानंद सागर के सहायक रहे डॉ. प्रकाश रघुवंशी के वि_ल भाई से मधुर संबंध थे। रघुवंशी ने उनसे कहा कि हम उज्जैन में प्रतिवर्ष क्रांतिवीर अवॉर्ड देते हैं। समिति की चाहत है कि आपके साथ मनोज कुमार भी आएं। यह बात २००५ की है। विट्ठल भाई बोले, मैं बात करके देखता हूं, वैसे उनकी सेहत ठीक नहीं रहती है। उन्होंने कार्यक्रमों में आना-जाना बंद कर दिया है। फिर भी पटेल ने मनोज कुमार से चर्चा की। वे राजी हो गए। इधर पूरी तैयारी हो गई। कार्ड छप गए। उधर मनोज कुमार उज्जैन आने के लिए तैयार हो गए। कमर दर्द के कारण वे हवाई यात्रा नहीं करते थे। ट्रेन के टिकट बुक हो गए। ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। मनोज कुमार की तीन अपै्रल को तबीयत खराब हो गई। यात्रा टल गई। डॉ. रघुवंशी बताते हैं, विट्ठल भाई कार्यक्रम में आ गए थे, लेकिन क्रांतिवीर अवॉर्ड हमने उन्हें उनके निवास मुंबई जाकर दिया।
पुष्पगिरी तीर्थ तक आ गए थे
एक बार फिर अवसर बना। केशव राय बताते हैं कि वे मालवा रंगमंच की ओर से मनोज कुमार को सम्मानित करना चाहते थे। वे देवास के पास पुष्पगिरी तीर्थ में दो दिन तक रहे। इधर उज्जैन में कार्यक्रम होने वाला था। उनकी कमर में तेज दर्द उठा और वे उज्जैन नहीं आ सके। लिहाजा, जाते समय ट्रेन में उन्हें सम्मानित किया गया। अपने जमाने में कई फिल्म कलाकारों को उज्जैन लाकर महाकाल के दर्शन कराने वाले रमण त्रिवेदी ने भी प्रयास किए थे, लेकिन वे नहीं आ सके।