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कब है शीतला सप्तमी? जानें पूजा का मुहूर्त व विधि

चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी को ठंडा खाने की परंपरा है. इन तिथियों को शीतला सप्तमी कहा जाता है. इस साल शीतला सप्तमी  10 मार्च 2026 को है. इसे बासोड़ा भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन माता शीतला को ठंडा भोग अर्पित करते हैं. शीतला सप्तमी की पूजा क्यों की जाती है इसका महत्व क्या है, इस दिन कौन सा भोग लगता है सभी बातें जान लें.

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शीतला सप्तमी 2026 तिथि व मुहूर्त 

  • शीतला सप्तमी – 10 मार्च 2026, मंगलवार
  • शीतला सप्तमी पूजा मुहूर्त – 06:04 AM से 05:56 PM
  • सप्तमी तिथि प्रारम्भ – 09 मार्च 2026 को 11:27 PM बजे
  • सप्तमी तिथि समाप्त – 11 मार्च 2026 को 01:54 AM बजे

क्यों होती है शीतला माता की पूजा

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शीतला माता को हिन्दू धर्म में रोग-निवारण की देवी के रूप में पूजा जाता है. वे मुख्य रूप से चेचक (Smallpox), खसरा, बुखार और अन्य संक्रामक बीमारियों से रक्षा करने वाली माता मानी जाती हैं. शीतला माता की पूजा बच्चों को इन गंभीर बीमारियों से बचाने के लिए और परिवार में स्वास्थ्य, शांति और रोगमुक्ति के लिए की जाती है. संतान की खुशहाली और अनंत सौभाग्य की प्राप्ति के लिए भी इस दिन व्रत किया जाता है.

कौंन थी माता शीतला

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माता शीतला के स्वरूप की बात करें तो स्कन्द पुराण में इसका अत्यधिक विस्तार से वर्णन करके बताया गया है। उसमें माँ शीतला के बारे में यह बताया गया है कि शीतला माता चेचक जैसे रोगों की देवी है। इनके स्वरूप के वर्णन के अनुसार इनके हाथों में सूप, कलश, झाडू, नीम के पत्ते और कलश इत्यादि उपस्थित है।

माता शीतला की सवारी गधा है जिस पर माँ सवारी करती हैं। इसके अलावा माता शीतला के साथ-साथ ज्वरसुर के दैत्य, चौसठ रोग, हैजा की देवी, त्वचा रोग के देवता घेटुकर्ण तथा रक्तवती देवी यह सभी बताये गये देवी-देवता भी माता शीतला के साथ विराजमान है। इसके अलावा माता के कलश में दाल के दाने के रूप में विषाणु, स्वास्थ्य वर्धक और रोगाणुनाशक जल है इसके अलावा उनके जल में 33 करोड़ देवी-देवताओं का भी निवास हैं।

माँ शीतला के हाथो में स्थित झाडू का मतलब लोगों कोे समाज के प्रति जागरूक करना भी है। कहा जाता है कि माता शीतला देवी की पूजा करने से व्यक्ति के सभी प्रकार के पापों और रोगों का भी नाश हो जाता है।

शीतला सप्तमी पूजा सामग्री और पूजा विधि

शीतला सप्तमी की विधिपूर्वक पूजन के लिए आवश्यक सामग्रियाँ। रोली, कुमकुम, अक्षत, मेंहदी, हल्दी, वस्त्र, मौली, दक्षिणा, फूल, दही, जल से भरा कलश, होली के बड़कुले, व्रत की कथा, आटे का दीपक, प्रसाद, मीठा आत, खाजा, नमक पारा, चूरमा, खाजा, पुए, पकौड़ी, बेसन चक्की, बाजरे की रोटी, चने की दाल, पूरी  इत्यादि सामग्रियाँ माँ शीतला देवी की पूजा-अर्चना करने के लिए ले लें।

शीतला माता पूजा विधि

 शीतला माता की पूजा के लिए सप्तमी तिथि के दिन प्रातः जल्दी उठकर ठंडे पानी से स्नान करना चाहिए उसके बाद शीतला माता की मूर्ति के समक्ष स्वच्छ जल अर्पित करना चाहिए।

सप्तमी तिथि के एक दिन पहले प्रसाद बनाकर रख लें इसके लिए पहले चूल्हे की अच्छी तरह से सफाई करके स्नान करने के बाद ही भोग को बनायें।

उसके बाद रोली, मेंहदी, हल्दी, अक्षत और कलावा अर्पित करें यह सभी पूजा की सामग्रियाँ उन पर अर्पित करते समय यहाँ बताये गये ‘हं श्री शीतलायै नमः’ मंत्र का उच्चारण अवश्य करें

उसके बाद आटे के दीपक में शुद्ध घी और उसमें बाती डालकर केवल मूर्ति के सामने रख दें उसे प्रज्वलित न करें।

यह सभी विधि हो जाने के बाद बासी हलवे, बाजरे की रोटी, पूरी और राबड़ी इत्यादि का भोग लगायें।

भोग लगा लेने के बाद माँ शीतला देवी के शीतलाष्टक स्त्रोत का पाठ करें पाठ करने के बाद ध्यानपूर्वक शीतला सप्तमी के व्रत की कथा सुनें।

उसके बाद दोबारा माँ शीतला माता को जल चढ़ाकर बहते हुए जल में से थोड़ा सा जल लोटे में अवश्य रख लें यह जल अत्यधिक पवित्र माना जाता है। लोटे में लिए हुए जल को घर के सभी सदस्यों के आँख में लगायें और घर के हर एक कोने में इस जल का छिड़काव करें।

अब होलिका दहन वाले स्थान पर भी जल चढ़ाकर विधिपूर्वक पूजा करें।

अब उसके बाद हल्दी को गिला करके अपने हाथ में लगाकर घर के मुख्य द्वार या रसोई घर के दरवाजे पर छाप लगाकर उस पर कुमकुम और अक्षत अवश्य लगायें।

अंत में भोग लगाये गये पकवान के साथ-साथ नीम का पत्ता भी भोग के साथ अपने परिवार के सदस्यों को खिलायें कहा जाता है नीम के पत्ते खाने से सारे रोग, दोष हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं।

शीतला माता का शक्तिशाली मंत्र

शीतले त्वं जगन्माता, शीतले त्वं जगत् पिता।
शीतले त्वं जगद्धात्री, शीतलायै नमो नमः।।

शीतलाष्टमी की व्रत कथा

एक बार शीतला माता ने सोचा कि चलो आज देखूं कि धरती पर मेरी पूजा कौन करता है, कौन मुझे मानता है। यही सोचकर शीतला माता धरती पर राजस्थान के डुंगरी गाँव में आईं और देखा कि इस गाँव में मेरा मंदिर नहीं है, और ना ही मेरी पूजा होती है।

माता शीतला गाँव की गलियों में घूम रही थी, तभी एक मकान के ऊपर से किसी ने चावल का उबला पानी (मांड) नीचे फेंका। वह उबलता पानी शीतला माता के ऊपर गिरा जिससे शीतला माता के शरीर में फफोले/छाले पड गये। शीतला माता के पूरे शरीर में जलन होने लगी।

शीतला माता गाँव में इधर-उधर भाग-भाग के चिल्लाने लगी अरे में जल गई, मेरा शरीर तप रहा है, जल रहा है। कोई मेरी सहायता करो। लेकिन उस गाँव में किसी ने शीतला माता की सहायता नही की। वहीं अपने घर के बाहर एक कुम्हारन महिला बैठी थी। उस कुम्हारन ने देखा कि अरे यह बूढी माई तो बहुत जल गई है। इसके पूरे शरीर में तपन है। इसके पूरे शरीर में फफोले पड़ गये है। यह तपन सहन नहीं कर पा रही है।

तब उस कुम्हारन ने कहा हे माँ! तू यहाँ आकार बैठ जा, मैं तेरे शरीर के ऊपर ठंडा पानी डालती हूँ। कुम्हारन ने उस बूढी माई पर खूब ठंडा पानी डाला और बोली हे माँ! मेरे घर में रात की बनी हुई राबड़ी रखी है थोड़ा दही भी है। तू दही-राबड़ी खा लें। जब बूढी माई ने ठंडी ज्वार के आटे की राबड़ी और दही खाया तो उसके शरीर को ठंडक मिली।

तब उस कुम्हारन ने कहा – आ माँ बैठजा तेरे सिर के बाल बहुत बिखरे हैं, ला मैं तेरी चोटी गूँथ देती हूँ।
और कुम्हारन माई की चोटी गूथने हेतु कंगी बालो में करती रही। अचानक कुम्हारन की नजर उस बूढ़ी माई के सिर के पीछे पड़ी, तो कुम्हारन ने देखा कि एक आँख बालों के अंदर छुपी है।
यह देखकर वह कुम्हारन डर के मारे घबराकर भागने लगी तभी उस बूढ़ी माई ने कहा – रुकजा बेटी तू डर मत। मैं कोई भूत-प्रेत नही हूँ। मैं शीतला देवी हूँ मैं तो इस घरती पर देखने आई थी कि मुझे कौन मानता है। कौन मेरी पूजा करता है। इतना कहकर माता चारभुजा वाली हीरे जवाहरात के आभूषण पहने सिर पर स्वर्णमुकुट धारण किये अपने असली रुप में प्रगट हो गई।

माता के दर्शन कर कुम्हारन सोचने लगी कि अब मैं गरीब इन माता को कहाँ बिठाऊ।
तब माता बोली – हे बेटी! तुम किस सोच मे पड गई।
तब उस कुम्हारन ने हाथ जोड़कर आँखो में आँसू बहते हुए कहा – हे माँ! मेरे घर में तो चारो तरफ दरिद्रता बिखरी हुई है। मैं आपको कहाँ बिठाऊ। मेरे घर में ना तो चौकी है, ना बैठने का आसन ही।

तब शीतला माता प्रसन्न होकर उस कुम्हारन के घर पर खड़े हुए गधे पर बैठ कर एक हाथ में झाड़ू दूसरे हाथ में डलिया लेकर उस कुम्हारन के घर की दरिद्रता को झाड़कर डलिया में भरकर फैंक दिया।
और उस कुम्हारन से कहा – हे बेटी! मैं तेरी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हूँ, अब तुझे जो भी चाहिये मुझसे वरदान मांग लो।

तब कुम्हारन ने हाथ जोड़ कर कहा – हे माता मेरी इच्छा है अब आप इसी डुंगरी गाँव मे स्थापित होकर यहीं निवास करें और जिस प्रकार आपने मेरे घर की दरिद्रता को अपनी झाड़ू से साफ कर दिया। ऐसे ही आपको जो भी भक्त होली के बाद की सप्तमी को भक्ति-भाव से पूजा कर, अष्टमी के दिन आपको ठंडा जल, दही व बासी ठंडा भोजन चढ़ाये उसके घर की दरिद्रता को दूर करना एवं आपकी पूजा करने वाली महिला का अखंड सुहाग रखना, उसकी गोद हमेशा भरी रखना। साथ ही जो पुरुष शीतला सप्तमी ,अष्टमी को नाई के यहाँ बाल ना कटवाये धोबी को कपड़े धुलने ना दें और पुरुष भी आप पर ठंडा जल चढ़ाकर, नरियल फूल चढ़ाकर परिवार सहित ठंडा बासी भोजन करे उसके काम धंधे व्यापार मे कभी दरिद्रता ना आये।

तब माता बोलीं तथास्तु! हे बेटी! जो तूने वरदान मांगे हैं मैं सब तुझे देती हूँ। हे बेटी! तुझे आर्शिवाद देती हूँ कि मेरी पूजा का मुख्य अधिकार इस धरती पर सिर्फ कुम्हार जाति का ही होगा। तभी उसी दिन से डुंगरी गाँव में शीतला माता स्थापित हो गई और उस गाँव का नाम हो गया शील की डुंगरी।

शील की डुंगरी भारत का एक मात्र मुख्य मंदिर है। शीतला सप्तमी के दिन यहाँ बहुत विशाल मेला लगता है।
शीतला माता की जय!

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