Advertisement

क्या आपका बच्चा भी परीक्षा के दिनों में स्ट्रेस लेता है ? जानें सफल पेरेंट्स का तरीका

अक्सर देखा जाता है कि कुछ बच्चे एग्जाम्स के दिनों में भी बिल्कुल रिलैक्स और आत्मविश्वास से लबरेज नजर आते हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि मानो स्ट्रेस या प्रेशर जैसी चीजें उन पर कोई असर ही नहीं डाल पा रहीं। इसकी असली वजह सिर्फ उनका इंटेलिजेंट होना या घंटों तक पढ़ाई करना नहीं है, बल्कि उनके घर का पॉजिटिव एटमॉस्फेयर (माहौल) इसमें सबसे बड़ा रोल निभाता है। ऐसे बच्चों के पेरेंट्स सिर्फ नंबर्स या रिजल्ट के पीछे नहीं भागते, बल्कि वे बचपन से ही बच्चों के भीतर सेल्फ-कॉन्फिडेंस, मेंटल स्ट्रेंथ और लाइफ का बैलेंस बनाना सिखाते हैं।

Advertisement

क्यों और कैसे आता है बच्चों में यह बदलाव?

बेहद कॉन्फिडेंट और लाइफ में आगे रहने वाले बच्चे आमतौर पर ऐसे परिवारों में बड़े होते हैं, जहाँ उनकी कोशिशों को सिर्फ फाइनल रिजल्ट से तौलकर नहीं देखा जाता। उनके माता-पिता इस हकीकत को बखूबी समझते हैं कि हर बार टॉप करना या फर्स्ट आना मुमकिन नहीं है, लेकिन लगातार मेहनत करते रहना सबसे ज्यादा जरूरी है।

जब बच्चों को सिर्फ अच्छे मार्क्स लाने पर ही नहीं, बल्कि उनके हार्ड वर्क और डेडिकेशन के लिए भी तारीफ मिलती है, तो उनके दिल से फेल होने का डर धीरे-धीरे खत्म हो जाता है। वे इस बात को समझ जाते हैं कि किसी एक एग्जाम में कम नंबर आने से उनकी काबिलियत या टैलेंट कम नहीं हो जाता।

Advertisement

होम एनवायरमेंट का क्या असर पड़ता है?

बच्चों के माइंडसेट को तैयार करने में उनके घर का माहौल सबसे ज्यादा मायने रखता है। समझदार परिवार परीक्षाओं को किसी जंग या लड़ाई की तरह नहीं लेते। वहाँ पढ़ाई-लिखाई को लेकर एक सही अनुशासन (डिसिप्लिन) तो जरूर होता है, लेकिन डर, खौफ या डिप्रेशन जैसा माहौल बिल्कुल नहीं बनाया जाता।

बच्चों को मन में यह पक्का भरोसा होता है कि अगर कभी किसी वजह से उनके नंबर कम भी आ गए, तो उन्हें घर पर डांट-फटकार, गुस्से या किसी तरह के अपमान का सामना नहीं करना पड़ेगा। यही अटूट भरोसा बच्चों को खुलकर अपनी बात रखने, सवाल पूछने और हमेशा कुछ नया सीखने की हिम्मत देता है।

Advertisement

कॉन्फिडेंट बच्चों के माता-पिता की खास आदतें

  • गलतियों से सिखाना: ऐसे पेरेंट्स बच्चों को बहुत छोटी उम्र से ही उतार-चढ़ाव और हार-जीत का मतलब समझाते हैं। वे बच्चों की हर छोटी मुसीबत में खुद कूदने के बजाय, उन्हें अपनी समस्या खुद सुलझाने का मौका देते हैं। वे बच्चों को यह समझाते हैं कि कमी कहाँ रह गई और अगली बार उसे कैसे सुधारा जा सकता है। इससे बच्चे मेंटली स्ट्रांग बनते हैं और छोटी-मोटी असफलताओं से कभी टूटते नहीं।

  • सोचने और बोलने की आजादी: इन घरों में बच्चों पर सिर्फ अपनी मर्जी या आदेश नहीं थोपे जाते, बल्कि उन्हें अपनी राय रखने और खुलकर सोचने की पूरी छूट होती है।

  • छोटे फैसले खुद लेने देना: माता-पिता बच्चों के विचारों को ध्यान से सुनते हैं, उनसे राय लेते हैं और लाइफ के छोटे-मोटे डिसीजन्स उन्हें खुद लेने देते हैं। पेरेंट्स की यही सीख आगे चलकर पढ़ाई के साथ-साथ जिंदगी के हर मोड़ पर बच्चों का मनोबल और डिसीजन मेकिंग पावर बढ़ाती है।

बच्चों की मनोदशा को पहचानें: आलस या कोई मानसिक उलझन?

कामयाब और खुशहाल बच्चों के माता-पिता सिर्फ उनकी मार्कशीट या रिपोर्ट कार्ड देखकर उनके भविष्य का फैसला नहीं करते। वे नंबर्स से आगे बढ़कर बच्चे के डेली बिहेवियर, उसके चेहरे की थकान, उदासी और मानसिक तनाव को भी बारीकी से भांपने की कोशिश करते हैं।

अक्सर जब किसी बच्चे की पढ़ाई या परफॉर्मेंस में गिरावट आने लगती है, तो लोग उसे लापरवाही या आलस का नाम दे देते हैं। जबकि कई बार इसकी असली वजह आलस नहीं, बल्कि उनके दिमाग पर बढ़ा कोई मानसिक प्रेशर या अकेलेपन का अहसास भी हो सकता है। जब बच्चों को यह भरोसा हो जाता है कि उनके पेरेंट्स उन्हें डांटने के बजाय उनकी मनोस्थिति को समझ रहे हैं, तो वे बिना किसी डर के अपनी हर छोटी-बड़ी परेशानी और दिल की बात उनके साथ शेयर करने लगते हैं।

महत्वपूर्ण सूचना: यह जानकारी अलग-अलग शोध अध्ययनों और एक्सपर्ट्स के विचारों पर आधारित है। इसे किसी भी तरह से डॉक्टरी परामर्श या मेडिकल ट्रीटमेंट का विकल्प न समझें। अपनी लाइफस्टाइल में किसी भी तरह का नया बदलाव करने, नई एक्टिविटी शुरू करने या एक्सरसाइज अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से राय जरूर लें।

Related Articles

📢 पूरी खबर पढ़ने के लिए

बेहतर अनुभव के लिए ऐप का उपयोग करें

ऐप में पढ़ें
ऐप खोलें
ब्राउज़र में जारी रखें